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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 329 of 421

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Page 329

उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय
ऊर्ध्वा ऽ अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोची १४ ष्यग्नेः.
द्युमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः.. (११)
अग्नि की लपटें पवित्र, चमकीली, ऊपर की ओर जाती हैं. वे लपटें समिधा
से ऊर्ध्वगमन करती हैं और स्वर्गलोक तक जाती हैं. अग्नि की लपटें यजमान के
लिए श्रेष्ठ प्रतीक हैं. ( ११ )
तनूनपादसुरो विश्ववेदा देवो देवेषु देवः. पथो अनक्तु मध्वा घृतेन.. (१२)
हे अग्नि! आप देवताओं के देव, सर्वज्ञाता, शरीर रक्षक व असुरनाशक हैं.
आप मधुर घी की आहुतियों से अपने पथ पर बढ़ने की कृपा कीजिए. आप हमें भी
श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा दीजिए. ( १२ )
मध्वा यज्ञं नक्षसे प्रीणानो नराश १४ सो अग्ने. सुकृद्देवः सविता विश्ववारः.. (१३)
हे अग्नि! आप को प्राणी यज्ञ में मधु ( आदि सामग्रियों से ) पूजते हैं. आप
सर्वप्रिय हैं. आप श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप सभी को प्रिय लगते हैं. ( १३ )
अच्छायमेति शवसा घृतेनेडानो वह्निर्नमसा. अग्नि १४ स्रुचो अध्वरेषु प्रयत्सु.. (१४)
अग्नि! यज्ञ में अध्वर्यु प्रयत्नपूर्वक घी से आहुति प्रदान कर रहे हैं. अग्नि को
नमन कर रहे हैं. विभिन्न प्रार्थनाओं से अग्नि के समीप जाते हैं. ( १४ )
स यक्षदस्य महिमानमग्नेः स ईं मन्द्रा सुप्रयसः. वसुश्चेतिष्ठो वसुधातमश्च.. (१५)
हे अग्नि! आप महिमावान, प्रकाशमान, श्रेष्ठ संपत्तिदाता व धनवान हैं. हम
आनंदपूर्वक धनधारी अग्नि को आहुति प्रदान करते हैं. ( १५ )
द्वारो देवीरन्वस्य विश्वे व्रता ददन्ते अग्नेः. उरुव्यचसो धाम्ना पत्यमानाः.. (१६)
हे अग्नि! आप देवों का द्वार, व्रतशील व वर्चस्वी हैं. आप हम सभी की रक्षा
करते हैं. ( १६ )
ते अस्य योषणे दिव्ये न योना उषासानक्ता. इमं यज्ञमवतामध्वरं नः.. (१७)
अग्नि की दो दिव्य देवियां हैं—उषा व रात्रि. ये दोनों देवियां हमारे यज्ञ में
अग्नि के साथ विराजने की कृपा करें. ( १७ )
दैव्या होतारा ऽ ऊर्ध्वमध्वरं नोग्नेर्जिह्वामभि गृणीतम्. कृणुतं नः स्विष्टिम्.. (१८)
दिव्य अध्वर्यु अग्नि और वायु! विधिवत इस यज्ञ को संपन्न कराने की कृपा
करें. अग्नि की जिह्वा ऊपर की ओर बढ़ती है. वे हमें भी ऊपर बढ़ने की प्रेरणा देने
की कृपा करें. ( १८ )
यजुर्वेद - ३२९