यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
यज्ञ के उदर ( पेट ) में जो अधपचे अन्न, गंध आदि निकल रहे हैं, उन की
शांति भलीभांति किए गए यज्ञ के उपचार से हो. वे पचें यह पाचन देवगणों के
अनुसार हो. ( ३३ )
यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति.
मा तद्भूम्यामाश्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु.. ( ३४)
जो आप के अग्नि से पचाए जाते हुए अंग, ( दर्द ) से शूल इधरउधर दौड़ते हुए
गिर गए हैं, उन्हें भूमि पर ही मत पड़ा रहने दीजिए. कहीं वे तिनकों में ही न मिल
जाएं. वे भी देवताओं का भोजन बनें. ( ३४ )
ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ऽ ईमाहुः सुरभिर्निर्हुरेति.
ये चार्वतो मा ऴ् सभिक्षामुपासत ऽ उतो तेषामभिगूर्तिर्न ऽ इन्वतु.. ( ३५)
जो इस अन्न व पुरोडाश को पकता हुआ देखते हैं, जो इस पुरोडाश को सुगंध
युक्त बनाते हैं, जो इस अन्न से बने पुरोडाश को मांगते हैं, उन का पुरुषार्थ भी
हमारे लिए फलीभूत हो. ( ३५ )
यन्नीक्षणं माँस्पचन्या ऽ उखाया या पात्राणि यूष्ण ऽ आसेचनानि.
ऊष्मण्यापिधाना चरूणामङ्काः सूनाः परि भूषन्त्यश्वम्.. ( ३६)
जो पुरोडाश को पात्र में बनता ( पकता ) हुआ देखते हैं, जो पात्र को मांज कर
पूरी तरह साफ करते हैं, ऊष्मा को रोकने वाले चरु आदि को गोद में रखते हैं, वे
सभी इस यज्ञ को भूषित करने की कृपा करें. ( ३६ )
मा त्वानिन्धर्न्नयीद्धूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रिः.
इष्टं वीतमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्.. ( ३७)
हे पुरोडाश! धुएं वाली आग और गंध आप को पीड़ा न दें. चमकीला उखा
आप को पीड़ा न दे. इस प्रकार पके हुए पुरोडाश को देवगण भलीभांति स्वीकार
करते हैं. ( ३७ )
निक्रमणं निषदनं विवर्तनं यच्च पड्वीशमर्वतः.
यच्च पपौ यच्च घासिं जघास सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३८)
हे यज्ञ अश्व! आप का निकलना, बैठना, हिलना, पलटना, खानापीना आदि
सभी क्रियाएं देवताओं के ही बीच में हों. ( ३८ )
यदश्वाय वास ऽ उपस्तृणन्त्यधीवासं या हिरण्यान्यस्मै.
सन्दानमर्वन्तं पड्वीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति.. ( ३९)
अश्व का वस्त्र, ऊपर का आवरण वस्त्र, अधिवास ( नीचे का वस्त्र ) सोने के
यजुर्वेद - ३१९