यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
जब यजमान हवि को तीन देवमार्गों से चारों ओर घोड़े की तरह ले जाते हैं,
तब यहां यह अज पोषण का प्रथम भाग पा कर देवताओं के लिए यज्ञ का प्रतिवेदन
करता है. ( २७ )
होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ ऽ उत श ᳵ स्ता सुविप्रः.
तेन यज्ञेन स्वंरकृतेन स्विष्टेन वक्षणा ऽ आ पृणध्वम्.. ( २८ )
होता, अध्वर्यु, प्रतिस्थाता, आग्नीध्र, ग्रावस्तोता, प्रशास्ता, विद्वान् ब्रह्मा आदि
हे यजमानो! आप उस यज्ञ से इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रवाहों को पूर्ण
करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति.
ये चार्वते पचन ᳵ सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न ऽ इन्वतु.. ( २९ )
खंभे का निर्माण करने वाले, उस को वहन करने वाले लोहे और लकड़ी की
फिरकी के निर्माता घोड़े के लिए खंभे बनाने वाले—इन सभी लोगों का कार्य
हमारे यज्ञ का हित साधने वाला हो. ( २९ )
उप प्रागात्सुन्मनेधायि मन्म देवानामाशा ऽ उप वीतपृष्ठः.
अन्वेनं विप्रा ऽ ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम्.. ( ३० )
हम अच्छे मन से यज्ञ का फल पाएं. यह घोड़ा देवताओं की भी इच्छा पूरी
करने का सामर्थ्य रखता है. देवताओं को भी आनंदित करता है. देवगण भी इसे
अपना मित्र मानते हैं. ब्राह्मण तथा ऋषिगण इस का अनुमोदन करने की कृपा
करें. ( ३० )
यद्वाजिनो दाम सन्दानमर्वतो या शीर्षण्या रशना रज्जुरस्य.
यद्वा घास्य प्रभृतमास्ये तृण ᳵ सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३१ )
इस शक्तिशाली और चंचल को नियंत्रण में रखने के लिए गरदन का बंधन
देवताओं को समर्पित हो. इस शक्तिशाली को नियंत्रण में रखने के लिए कमर तथा
सिर के बंधन देवताओं को समर्पित हों. इस शक्तिशाली व घास, तृण आदि देवताओं
को नियंत्रण में रखने के लिए गरदन का बंधन देवताओं को समर्पित हो. ( ३१ )
यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति.
यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३२ )
जिस अश्व का बचाखुचा भाग मक्खियां खाती हैं, जो भाग यजमान के हाथों
और अंगुलियों में लगा रहता है, वह सब भी देवताओं के प्रति समर्पित हो. ( ३२ )
यदूवध्यमुदरस्यापवाति य ऽ आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति.
सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेध ᳵ शृतपाकं पचन्तु.. ( ३३ )
३१८ - यजुर्वेद