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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

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Page 271

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
अदिति देवी महामहिमाशालिनी, माता, सुव्रतों वाली, अमर, कभी वृद्ध नहीं
होने वाली हैं, सुखदायिनी व नीतिज्ञा हैं. हम अपनी रक्षा हेतु उन का आह्वान करते
हैं. ( ५ )
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहस ᳪ सुशर्माणमदिति ᳪ सुप्रणीतिम्.
दैवीं नाव ᳪ स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. ( ६ )
अदितिमाता भलीभांति रक्षा करने वाली, पृथ्‍वीलोक से स्वर्गलोक तक
विस्तार वाली, अत्यंत सुखदायिनी, अच्छा आसरा ( आश्रय ) देने वाली, दोषरहित,
मृत्यु का भय दूर करने वाली हैं. अपनेआप चलने वाली, बिना छेदों वाली इस नौका
में आप की कृपा से हम आरोहण करें. हम अपने कल्याण के लिए उस पर चढ़ते
हैं. ( ६ )
सुनावमा रुहेयमस्त्रवन्तीमनागसम्. शतारित्रा ᳪ स्वस्तये.. (७)
यह नाव दोष रहित, बिना छेदों वाली, अपनेआप चलने वाली व सैकड़ों
शत्रुओं से त्राण करने वाली है. हम अपने कल्याण के लिए इस पर आरूढ़ ( चढ़ने )
होने की कृपा करें. ( ७ )
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ᳪ सि सुक्रतू.. (८)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे यहां गाय के घी से सींचिए. आप हमारे खेतों
को मधुर अमृत से सींचिए. ( ८ )
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न ऽ आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ मा जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (९)
हे मित्र व वरुण देव! आप दोनों देव हमारी प्रार्थना सुनिए. आप अपनी भुजाएं
फैला कर हमें आशीर्वाद व इस जीवन में यश दीजिए. आप हमारे यज्ञ को गाय के
घी से व खेत को मधु अमृत से सींचिए. ( ९ )
शन्नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तो ऽ हिं वृक ᳪ रक्षा ᳪ सि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः... (१०)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे लिए सुखदायी होइए. हम आप के लिए
अन्नमय हवि देते हैं. आप हमारे रोग दूर कीजिए. आप हमारे शत्रुओं व राक्षसों का
विनाश कीजिए. आप भेड़िए और ऐसे ही हिंसक जीवों को हम से दूर भगाइए. ( १० )
वाजे वाजेवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः... (११)
हे मित्र व वरुण देव! आप ब्राह्मण, अमर व सत्यज्ञ हैं. युद्ध में अन्न, बल तथा
यजुर्वेद - २७१