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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 253 of 421

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Page 253

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमारों ने दूध से चमकीला अमृत उपजाया. मूत्र
को उपजाया. वीर्य को उपजाया. अज्ञानवाली बुद्धि दुर्मति जन्य बाधाओं को दूर
किया. ऊवध्य और वात को बाहर निकालने का प्रबंध किया. ( ८४ )
इन्द्र सुत्रामा हृदयेन सत्यं पुरोडाशेन सविता जजान.
यकृत् क्लोमानं वरुणो भिषज्यन् मतस्ने वायव्यैर्न मिनाति पित्तम्.. (८५)
इंद्र देव सुरक्षक हैं. उन्होंने हृदय से सत्य को जना. सविता देव ने पुरोडाश से
सत्य को जना. वरुण देव ने ओषध से यकृत को ठीक किया. गले की नाड़ी को
ठीक किया. वायु ने अस्थि और पित्त को यथावस्थित किया. ( ८५ )
आन्त्राणि स्थालीर्मधु पिन्वमाना गुदाः पात्राणि सुदुघा न धेनुः.
श्येनस्य पत्रं न प्लीहा शचीभिरासन्दी नाभिरुदरं न माता.. (८६)
पात्र थाली और आंतें पीए हुए रसों को गुदा और अन्य भागों तक संचरित
करते हैं. हमारे लिए ये अच्छी दुधारू गायों की तरह हैं. श्येन के पंख की तरह हमारा
प्लीहा है. नाभि आसंदी संचालक है. उदर माता की तरह है. ( ८६ )
कुम्भो वनिष्ठुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योन्यां गर्भो अन्तः.
प्लाशिर्व्यक्तः शतधार ऽ उत्सो दुहे न कुम्भी स्वधां पितृभ्यः.. (८७)
कुंभ ने बड़ी आंत को जना. कुंभ में स्थापित सोम से जननेंद्रियों का उद्भव
हुआ. शतधारी सोम ने मूल स्रोत को दुहा. कुंभी ने स्वधा को पितरों के लिए भेंट
किया. ( ८७ )
मुख १४ सदस्य शिर ऽ इत् सतेन जिह्वा पवित्रमश्विनासन्तसरस्वती.
चप्यं न पायुर्भिषगस्य वालो वस्तिर्न शेपो हरसो तरस्वी.. (८८)
इंद्र देव के इस शरीर में मुख और मस्तक सत्य से पवित्र हैं. सत् से जिह्वा और
वाणी पवित्र है. अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी ने इसे पवित्र बनाया है. गुदा
मलविसर्जन से शरीर को पवित्र बनाता है. वस्ति और शेष जननेंद्रिय हैं. ( ८८ )
अश्विभ्यां चक्षुरमृतं ग्रहाभ्यां छागेन तेजो हविषा शृतेन.
पक्ष्माणि गोधूमैः कुवलैरुतानि पेशो न शुक्रमसितं वसाते.. (८९)
दोनों अश्विनीकुमारों ने ग्रहों के रूप में दो अमर नेत्र सिरजे. छाग से तेज
सिरजा. हवि से नेत्रों में ज्योति सिरजी. गेहूं की बाल और पैरों से लोम सिरजे. नेत्र
दोनों पक्षों ( शुक्ल और कृष्ण ) का संरक्षण करते हैं. ( ८९ )
अविर्न मेषो नसि वीर्याय प्राणस्य पन्था ऽ अमृतो ग्रहाभ्याम्.
सरस्वत्युपवाकैर्व्यानं नस्यानि बर्हिर्बर्दरैर्जजान.. (९०)
यजुर्वेद - २५३