यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ
की प्राप्ति कराता है. (७८)
दृष्ट्वा परिस्रुतो रस ᳵ शुक्रेण शुक्लं व्यपिबत् पयः सोमं प्रजापतिः.
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान ᳵ शुक्रमन्धस ऽ इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतं मधु.. (७९)
प्रजापति ने निस्सृत सोम रस को दूध के साथ पीया. प्रजापति ने चमकीला
सोम रस को दूध के साथ पीया. यह ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों
में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता
है. (७९)
सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽ ऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति.
अश्विना यज्ञ ᳵ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं वरुणो भिषज्यन्.. (८०)
जैसे सीसे के यंत्र से तांत और ऊन आदि को बुना जाता है, वैसे ही मन से
मनीषी और कवि इस यज्ञ की वय की बढ़ोत्तरी करते हैं. अश्विनी देव यज्ञ को संपन्न
करते हैं. सविता देव, सरस्वती देवी, वरुण, इंद्र देव के रूप को ओषधियों से पुष्ट
करते हैं. (८०)
तदस्य रूपममृत ᳵ शचीभिस्तिस्रो दधुर्देवताः स ᳵ रणाः.
लोमानि शष्पैर्बहुधा न तोक्मभिस्त्वगस्य मा ᳵ सम्भवन्न लाजाः.. (८१)
इस यज्ञ के अमृतमय रूप को शची आदि तीनों देवताओं ने धारा. उन्होंने ही
इस की खोज की. बहुत प्रकार की घास के लोम उन के शरीर के रोम हुए. यज्ञ में
त्वक् को प्रकट किया. लाजा उन का मांस हुआ. (८१)
तदश्विना भिषजा रुद्रवर्तनी सरस्वती वयति पेशो अन्तरम्.
अस्थि मज्जानं मास्रैः कारोतरेण दधतो गवां त्वचि.. (८२)
वैद्य अश्विनीकुमार रुद्र जैसे स्वभाव के हैं. उन्होंने और देवी सरस्वती ने इंद्र
देव के शरीर को पूरा बनाया. अस्थि, मज्जा, मांस आदि और गायों की त्वचा
को धारा. (८२)
सरस्वती मनसा पेशलं वसु नासत्याभ्यां वयति दर्शतं वपुः.
रसं परिस्रुता न रोहितं नग्नहुर्धीरस्तसरं न वेम.. (८३)
सरस्वती देवी ने दोनों अश्विनीकुमारों के साथ मिल कर मन से विशेष सुंदर
तथा दर्शनीय शरीर की रचना की, रस ( लहू ) चुआया, धैर्य से विकार नाशक इस
को शरीर में उपजाया. (८३)
पयसा शुक्रममृतं जनित्र ᳵ सुरया मूत्राज्जनयन्त रेतः.
अपामतिं दुर्मतिं बाधमाना ऽ ऊवध्यं वात ᳵ सव्वं तदारात्.. (८४)
२५२ - यजुर्वेद