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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

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पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो व्याघ्र और विषूचिका दोनों की रक्षा करती है, जो भेड़िए की भी रक्षा
करती है, जो पतनशील बाज की रक्षा करती है, जो सिंह की रक्षा करती है, वही
( शक्ति ) यजमानों की भी रक्षा करने की कृपा करे. ( १० )
यदापिपेष मातरं पुत्रः प्रमुदितो धयन्.
एतत्तदग्ने अनृणो भवाम्यहन्तौ पितरौ मया.
सम्पृच स्थ सं मा भद्रेण पृङ्क्त विपृच स्थ वि मा पाप्मना पृङ्क्त.. (११)
दूध पीता हुआ बालक प्रमुदित होता हुआ मां को प्रताड़ित करता है, उसी
प्रकार हम मातापिता के ऋण से उऋण होना चाहते हैं. मातापिता कल्याणकारी हैं.
आप हमें पापों से दूर या अलग करने की कृपा कीजिए. ( ११ )
देवा यज्ञमतन्वत भेषजं भिषजाश्विना.
वाचा सरस्वती भिषगिन्द्रायेन्द्रियाणि दधतः.. (१२)
देवताओं व वैद्य अश्विनीकुमार ने यज्ञ का विस्तार किया. सरस्वती ने वाणी
से इंद्र देव के लिए इंद्रियों में क्षमता धारते हुए यज्ञ का विस्तार किया. ( १२ )
दीक्षायै रूप १४ शष्पाणि प्रायणीयस्य तोक्मानि.
क्रयस्य रूप १४ सोमस्य लाजाः सोमा १४ शवो मधु.. (१३)
दीक्षा के लिए प्रायणीय ( आरंभिक ) जौ यज्ञ रूप हैं. खरीदे गए लाजा सोम
के लिए कल्याणकारी व मधुमय हैं. ( १३ )
आतिथ्यरूपं मासरं महावीरस्य नग्नहुः. रूपमुपसदामेतत्तिस्रो रात्रीः सुरासुता.. (१४)
धन और ओषधियों का चूर्ण आतिथ्य रूप है. महान् वीरों के लिए उपयोगी है.
तीन रातों तक उपसद ( निकट जाने वाले ) के रूप में टपकता और सुरा बन जाता
है. ( १४ )
सोमस्य रूपं क्रीतस्य परिस्रुत्परिशिच्यते.
अश्विभ्यां दुग्धं भेषजमिन्द्रायेन्द्र १४ सरस्वत्या.. (१५)
खरीदे गए सोम का रूप चारों ओर से टपकता है. वैद्य अश्विनी व सरस्वती
देवी इंद्र देव के लिए दूध दुहती हैं. ( १५ )
आसन्दी रूप १४ राजासन्द्वै वेद्यै कुम्भी सुराधानी.
अन्तर ऽ उत्तरवेद्या रूपं कारोतरो भिषक्.. (१६)
सोम राजा स्वरूप हैं और राजा के आसन पर विराजमान हैं. वेदी पर सुरा का
कुंभ स्थापित किया गया है. दोनों के बीच उत्तरवेदी हैं. भिषक् के रूप में छलने
( छानने का यंत्र ) को स्थापित किया गया है. ( १६ )
यजुर्वेद - २४१