यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे सोम! आप पवित्र तेज झराइए. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को पवित्र कीजिए.
सोम इंद्रिय सामर्थ्य को प्रकट करता है. सरस हो कर सोम और अधिक आनंददायी
हो जाता है. यह देवों का देव व चमकीला है. यह यजमानों के लिए रसमय अन्न
धारण करता है. (५)
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिस्तेजसे त्वा
वीर्याय त्वा बलाय त्वा.. (६)
अन्नवान किसान पहले ही अन्न को काट कर रख लेता है, ताकि उस में से
पर्याप्त जौ निकल सके. ये यजमान कुश के आसन पर विराजमान हैं. यजमान
नमस्कारपूर्वक यज्ञ करते हैं. अश्विनी देवों, सरस्वती देवी, संरक्षक इंद्र देव के लिए
आप को उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल निवास है. हम तेज,
वीर्य व बल के लिए आप को यहां स्थापित करते हैं. (६)
नाना हि वां देवहित थ्ं सदस्कृतं मा स थ्ं सृक्षाथां परमे व्योमन्.
सुरा त्वमसि शुष्मिणी सोम ऽ एष मा मा हि थ्ं सी: स्वां योनिमाविशन्ती.. (७)
आप नाना प्रकार से देवताओं का हित व श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप परम
व्योम में स्थित रहते हैं. सुरा तुम बलवती हो. यह सोम अलग स्वभाव का है. आप
उस के मूल स्थान में प्रवेश करते हुए उस के प्रति हिंसा मत कीजिए. (७)
उपयामगृहीतोस्याश्विनं तेजः सारस्वतं वीर्यमैन्द्रं बलम्.
एष ते योनिर्मोदाय त्वा नन्दाय त्वा महसे त्वा.. (८)
सोम देव! आप उपयाम में ग्रहण किए गए हैं. अश्विनीकुमार के तेज के लिए
व सरस्वती देवी के पराक्रम के लिए आप को स्थापित करते हैं. हमारे लिए वीर्य
धारिए. (८)
तेजोसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोस्योजो
मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोसि सहो मयि धेहि.. (९)
आप बलवान हैं. हमारे लिए बल धारिए. आप ओजवान हैं. हमारे लिए ओज
धारिए. आप मन्यु (उत्साह) हैं. हमारे लिए उत्साह धारिए. आप सहनशील हैं.
आप हमारे लिए सहनशीलता धारिए. आप संघर्षशील हैं. आप हमारे लिए
संघर्षशीलता धारिए. (९)
या व्याघ्रं विषूचिकोभौ वृकं च रक्षति.
श्येनं पतत्रिण थ्ं सि थ्ं ह थ्ं सेमं पात्व थ्ं हसः.. (१०)
२४० - यजुर्वेद 632/15