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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 203 of 421

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Page 203

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय
पत्तों में विराजने वाले के लिए नमस्कार. नीचे गिरे हुए पत्तों में विराजने वाले के
लिए नमस्कार. उत्पन्न होने के लिए निरंतर प्रयास में रहने वाले के लिए नमस्कार.
शत्रुओं के संहारक के लिए नमस्कार. कर्महीन को दुःख देने वाले के लिए नमन. बाण
पैदा करने वाले के लिए नमन. धनुष पैदा करने वाले के लिए नमन. देवताओं के हृदय
में वास करने वाले के लिए नमन. सृष्टि का चिंतन करने वाले के लिए नमन. पापपुण्य
में रहने वालों को विभक्त करने वाले के लिए नमन. (४६)
द्रापे अन्धसस्पते दरिद्र नीललोहित.
आसां प्रजानामेषां पशूनां मा भेर्मा रोङ्मो च नः किंचनाममत्.. (४७)
हे रुद्र देव! आप पापियों को अधोगति देने वाले हैं. आप अन्न बल के
स्वामी हैं. आप नीले और लाल रंग के हैं. आप प्रजा को कष्ट न देने वाले हैं.
आप पशुओं को भयभीत नहीं होने देते हैं. आप हमें थोड़ा सा भी रोग ग्रस्त मत
होने दीजिए. (४७)
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः.
यथा शमसद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे ऽ अस्मिन्नानातुरम्.. (४८)
हम यजमान अपनी बुद्धि रुद्र देव को अर्पित करते हैं. वे वीरों के प्रेरक व अति
बलवान हैं. जैसे दोपायों और चौपायों के शांत रहने से गांव शांत रहते हैं, वैसे ही
हम सब के शांत और चिंता मुक्त रहने से हमारे गांव भी शांतिमय रहें. (४८)
या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाहा भेषजी.
शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे.. (४९)
हे रुद्र देव! आप कल्याण स्वरूप हैं. ओषधि की तरह बीमारी से मुक्त करने
वाले हैं. शरीर को ताजगी देने वाले हैं. आप का वह स्वरूप हमारे लिए सुखदायी
हो. (४९)
परि नो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु परि त्वेषस्य दुर्मतिरघायोः.
अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृड.. (५०)
हे रुद्र देव! आप हमें अस्त्रशस्त्रों से दूर रखिए. हम दुर्मति होने से बचें. हम
क्रोधित होने से बचें. हे मघवन्! आप अपना धनुष और प्रत्यंचा उतार दीजिए.
ताकि यजमान निर्भय हो सकें. आप हमारी पीढ़ियों को सुखी बनाने की कृपा
कीजिए. (५०)
मीढुष्टम शिवतम शिवो नः सुमना भव.
परमे वृक्ष ऽ आयुधं निधाय कृत्तिं वसान ऽ आ चर पिनाकं बिभ्रदा गहि.. (५१)
हे रुद्र देव! आप अभीष्ट फलदाता व अतीव कल्याण करने वाले हैं. आप
यजुर्वेद - २०३