यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
तक पहुंचती हैं. घोड़े भी रोज अग्नि को देख कर घुड़साल में आते हैं. अग्नि अपने
याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा करें (४१)
सो अग्निर्यो वसुर्गृणे सं यमायन्ति धेनवः.
समर्वन्तो रघुद्रुवः स ᳪ सुजातासः सूर्य ऽ इष ᳪ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४२)
अग्नि अपने धन के साथ ऐसे आते हैं, जैसे गाएं बाड़े में आती हैं. तेजगति वाले
घोड़े घुड़साल में आते हैं. संस्कारित यजमान अग्नि की उपासना करते हैं. अग्नि
अपने याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा करें. (४२)
उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीष ऽ आसनि.
उतो न ऽ उत्पूर्या उक्थेषु शवसस्पत ऽ इष ᳪ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४३)
हे अग्नि! आप चंद्रमा जैसे शांतिदाता हैं. आप घी की हवि ग्रहण करने के लिए
दोनों हाथों का उपयोग करते हैं. आप शक्तिमान हैं. हम मंत्रों (उक्थ) द्वारा आप
की उपासना करते हैं. आप अपने याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा
कीजिए. (४३)
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र ᳪ हृदिस्पृशम्. ऋध्यामा त ऽ ओहैः.. (४४)
हे अग्नि! जिस प्रकार प्रार्थनाओं से हम अश्वमेध के अश्व को प्रेरित करते हैं,
वैसे ही यज्ञ में हम कल्याणदायी प्रार्थनाओं से हृदय को स्पर्श करते हैं. अग्नि की
कृपा से यज्ञ संबंधी संकल्प मजबूत होते हैं. (४४)
अधा ह्यग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः. रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ.. (४५)
हे अग्नि! आप यज्ञ में कल्याणकारी व फलदायी हैं. आप दक्ष व कार्य साधक
हैं. सारथी की भांति आप ऋत के विशाल रथ के संचालक हैं. (४५)
एभिनॊ अर्कैर्भवा नो अर्वाङ्क् स्वर्ण ज्योतिः.
अग्ने विश्वेभिः सुमना ऽ अनीकैः.. (४६)
हे अग्नि! आप स्वर्णिम ज्योति व अच्छे मन वाले हैं. आप स्वर्णिम ज्योति सहित
हमारे यहां पधारने व हमारे जीवन को प्रकाशित करने की कृपा कीजिए. (४६)
अग्नि ᳪ होतां मन्ये दास्वन्तं वसु ᳪ सूनु ᳪ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्.
य ऽ ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा.
घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (४७)
हे अग्नि! हम आप को होता मानते हैं. आप कर्मशील व दाता हैं. आप धनवान,
साहस के पुत्र, सर्वज्ञ व ब्राह्मण हैं. आप हमारा सब कुछ जानते हैं. आप हमारे यज्ञ
में ऊपर की ओर गमन करते हैं. आप सब का सहारा हैं. आप घृतपान करते हैं.
१९० - यजुर्वेद