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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 189 of 421

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Page 189

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
स दुद्रवत्स्वाहुतः स दुद्रवत्स्वाहुतः.
सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देव २४ राधो जनानाम्.. (३४)
अग्नि द्रुत गतिमान हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. अग्नि द्रुत गतिमान हैं. हम
उन का आह्वान करते हैं. अग्नि यज्ञ के अच्छे ब्रह्मा व सुखदायी हैं. वे वैभव के
देव हैं और यजमान को धन देते हैं. (३४)
अग्ने वाजस्य गोमत ऽ ईशानः सहसो यहो. अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः.. (३५)
अग्नि अन्न, गौ के स्वामी, ईश्वर, सर्वज्ञ व शीघ्र प्रदीप्त होने वाले हैं. वे हमारे
लिए पृथ्वी पर धन बरसाने की कृपा करें. (३५)
स ऽ इधानो वसुष्कविर्निरीडेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (३६)
अग्नि ईंधनमान, धनवान व कवि हैं. हम वाणी से आप की उपासना करते हैं.
आप हमें पवित्र धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३६)
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (३७)
हे अग्नि! आप की लपटें विशाल हैं. आप चमकने वाले हैं. आप अपने तीक्ष्ण
रूप से राक्षसों के दाहक हैं. आप प्रातः हमारे यज्ञों में बाधक राक्षसों का नाश
कीजिए. (३७)
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा ऽ उत प्रशस्तयः.. (३८)
अग्नि हमारे कल्याण के लिए प्रकट होते हैं. हम कल्याण के लिए उन का
आह्वान करते हैं. वे हमारे लिए कल्याणकारी व सौभाग्यवर्द्धक धन प्रदान करते हैं.
हम कल्याणकारी यज्ञों में उन के लिए स्तोत्र गाते हैं. (३८)
भद्रा उत प्रशस्तयो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये. येना समत्सु सासहः.. (३९)
अग्नि जिस कल्याणकारी मन से वृत्रों का नाश करते हैं, उस कल्याणकारी
मन से हम उन की प्रशस्तियां गाते हैं, ताकि वे उत्साहपूर्वक हमारा कल्याण
करें. (३९)
येना समत्सु सासहोव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धताम्. वनेमा ते अभिष्टिभिः.. (४०)
अग्नि जिस उत्साह से आप शत्रुनाश करते हैं, उसी उत्साह से हमारे तन को
स्थिर करते हैं. हम आप की अभीष्ट कृपा से सुखी रहें. (४०)
अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः.
अस्तमर्वन्त ऽ आश्वोस्तान्नित्यासो वाजिन ऽ इष २४ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४१)
अग्नि को हम मानते हैं. हम उन के धन तक वैसे ही पहुंचते हैं, जैसे गौएं घर
यजुर्वेद - १८९