यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध नौवां अध्याय
से बृहस्पति देव की विजय हो. हे वनस्पतियो! हे वन के स्वामी! आप अपने घोड़े आदि
छोड़ दीजिए. जिस से इंद्र देव की विजय हो सके. इस विजय के बाद हे सेनापतियो!
आप घोड़े, हाथी आदि को आराम देने की कृपा कीजिए. ( १२ )
देवस्याह १४ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेर्वाजजितो वाजं जेष्म्.
वाजिनो वाजजितोध्वन स्कम्भुवन्तो योजना मिमानाः काष्ठां गच्छत.. (१३)
सविता देव! सत्य मार्ग के प्रेरक व सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. युद्ध में
विजयी होने वाले बृहस्पति देव का बल पा कर हम भी युद्ध में विजय पाएं. हमारे
बलशाली घोड़े बहुत वेगवान हैं. उन की कृपा से हम युद्ध में विजय पाते हैं. हम
शत्रुओं का मार्ग रोक कर इन्हीं घोड़ों के कारण कोसों की दूरी नापते हैं. सीमा के
पार पहुंच सकते हैं. ( १३ )
एष स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष ऽ आसनि.
क्रतुं दधिक्रा ऽ अनु स १४ सनिष्यदत्पथामङ्का १४ स्यन्वापनीफणत् स्वाहा.. (१४)
गरदन से लगाम, जीन आदि से बंधा हुआ यह घोड़ा वेग से चलता है. यह रास्ते
की सभी बाधाओं को पार कर लेता है. यह यज्ञ का अनुकरण और घोड़े पर बैठा
वीर शत्रुओं पर ( सफलता से ) प्रहार करता है. इस ( अश्व ) के लिए स्वाहा. ( १४ )
उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनुवाति प्रगर्धिनः.
श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः स्वाहा.. (१५)
हे यजमानो! जो पराक्रमी है, जो तीर की तरह वेगवान है, जो घोड़े की तरह
वेगशाली है, जो सत्यवादी है, जो बाज पक्षी की तरह वेगवान है, जिस घोड़े पर
बैठ कर वीर युद्धों में शत्रुओं पर विजय पाता है, यह आहुति उसी के लिए समर्पित
है. ( १५ )
शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तोहिं वृक १७ रक्षा १७ सि सनेम्यस्मद्युयवनमीवाः... (१६)
बलवान घोड़े हमारे लिए सुखदायी हों. वे दैवी आहुतियों में और भी सुशोभित
हों. ये घोड़े भेड़ियों की तरह आक्रमण करने वाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा
करें. सांप जैसे विश्वासघातियों से हमारी रक्षा करें. विघ्न करने वालों को हम से दूर
करने की कृपा करें. ( १६ )
ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः.
सहस्रसा मेधसाता सनिष्यवो महो ये धन १४ समिथेषु जभ्रिरे.. (१७)
हे यजमानो! वीर घोड़े पर सवारी करने वाले हैं. वे बहुत अधिक वेगवान हैं.
वे वीर हमारी वाणी को सुनने की कृपा करें. जो वीर हजारों को आनंद देते हैं, जो
११० - यजुर्वेद