यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध आठवां अध्याय
आह्वान करते हैं. आप को इंद्र देव व विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया
गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा के लिए स्थापित किया
जाता है. ( ४६ )
उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा गायत्रच्छन्दसं गृह्णामीन्द्राय त्वा त्रिष्टुप्छन्दसं गृह्णामि
विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जगच्छन्दसं गृह्णाम्यनुष्टुप्तेभिगरः.. (४७)
आप को इस अग्नि के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. हम इंद्र देव के
लिए गायत्री छंद से आप को ग्रहण करते हैं. हम आप को त्रिष्टुप् छंद से ग्रहण
करते हैं. हम आप को सभी देवों के लिए ग्रहण करते हैं. हम आप को सभी देवों
के लिए जगती छंद से ग्रहण करते हैं. हम आप के प्रति अनुष्टुप् छंद में वाणीमय
स्तुति करते हैं. ( ४७ )
व्रेेशीनां त्वा पत्मन्ना धूनोमि कुकूननानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि भन्दनानां त्वा पत्मन्ना
धूनोमि मदिन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि मधुन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि शुक्रं त्वा
शुक्र ऽ आ धूनोम्यह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु.. (४८)
हे सोम! हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. हम संसार के कल्याण
के लिए आप को कंपाते हैं. हम मेघों के जल के लिए आप को कंपाते हैं. आप
आनंददायी हैं. हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. आप मधुमान ( मधुरता
से लबालब भरे हुए हैं ). हम आप को मधु ( मधुरता ) बरसाने के लिए कंपाते हैं.
आप प्रकाशमान हैं. हम प्रकाश की वर्षा के लिए आप को कंपाते हैं. हम दिन
स्वरूप सूर्य की किरणों के लिए आप को कंपाते हैं. ( ४८ )
ककुभ ४९ रूपं वृषभस्य रोचते बृहच्छुक्रः शुक्रस्य पुरोगाः सोमः सोमस्य पुरोगाः.
यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै त्वा गृह्णामि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा.. (४९)
सोम बलवान, प्रकाशमान, विशाल व प्रकाश के आगे गमन करने वाले हैं.
सोम सोम के आगे गमन करने वाले अभयदाता व जाग्रत हैं. हम आप को ग्रहण
करते हैं. इसीलिए हे सोम! हम आप के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ४९ )
उशिक् त्वं देव सोमाग्नेः प्रियं पाथोपीहि वशी त्वं देव सोमेन्द्रस्य प्रियं
पाथोपीह्यस्मत्सखा त्वं देव सोम विश्वेषां देवानां प्रियं पाथोपीहि.. (५०)
हे सोम! आप अग्नि का ( मन भाता ) आहार बनिए. आप पथ के भोजन के
रूप में प्राप्त होइए. आप वंशवर्ती व सोम के प्रिय हैं. हे सोम! आप हमारे मित्र, आप
सभी को प्रिय व सब के लिए तृप्तिदायी हैं. ( ५० )
इह रतिरिह रमध्वमिह धृतिरिह स्वधृतिः स्वाहा.
उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन्.
रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा.. (५१)
यजुर्वेद - १०३