Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

by महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा)

DevanagariHindipublished96 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

Page 1Permalink

महामुनिश्रीपतञ्जलिविरचितम्
महाभाष्यम्
(पस्पशाह्निकम्)
अनुवादक एवं व्याख्याकार
रमण कुमार शर्मा
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
: दिल्ली :

Page 2Permalink

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) मुद्रित या लिखित नहीं है। यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।

Page 3Permalink

महामुनिश्रीपतञ्जलिविरचितम्
महाभाष्यम्
(पस्पशाह्निकम्)
अनुवादक एवं व्याख्याकार
रमण कुमार शर्मा
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
: दिल्ली

Page 4Permalink

प्रकाशक :
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
५८२५, न्यू चन्द्रावल, जवाहर नगर, दिल्ली-११०००७
© लेखक
प्रथम संस्करण : १६८२ (दिल्ली)
मुद्रक : अमर प्रिंटिंग प्रेस (श्याम प्रिंटिंग एजेन्सी),
८/२५, विजय नगर, दिल्ली-११०००६

Page 5Permalink

निवेदनम्
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
रमण कुमार शर्मा

Page 6Permalink

विषयसूची
१: पतञ्जलि, महाभाष्य और पस्पशाह्निक ७
२. पस्पशाह्निकम्—प्रदीप-भाष्यानुवाद-उषा-व्याख्या-संवलितम्— १-८०
१. अथ शब्दानुशासनम् १
२. गौरित्यत्र कः शब्दः ३
३. शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि ६
४. शास्त्रस्याधिकारी २७
५. शास्त्रप्रारम्भविधिः २८
६. किं पुनराकृतिः पदार्थ आहोस्वित् द्रव्यम् ३३
७. सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ३६
८. द्रव्यः पदार्थः ४२
९. आकृतिः पदार्थः ४४
१०. लोकस्य प्रामाण्यम् ४६
११. लोकतः अर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः ४७
१२. अस्त्यप्रयुक्तः ५१
१३. शब्दस्य ज्ञाने धर्मं आहोस्वित्प्रयोगे ५६
१४. व्याकरणमित्यस्य शब्दस्य पदार्थः ६२
१५. किमर्थो वर्णानामुपदेशः ७०

Page 7Permalink

भूमिका
पतञ्जलि, महाभाष्य और पस्पशाह्निक
प्रक्रियात्मक और दार्शनिक इन दोनों ही पक्षों में समान गति होने के कारण
व्याकरण समस्त ज्ञान शाखाओं में विशिष्ट है । सूक्ष्म रूप से यदि विचार किया
जाये तो व्याकरणशास्त्र के इन दोनों ही पक्षों के मूल को एक ही वैदिक वाक्य
“इष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः”१ में ढूंढा जा सकता है । वाणी के
चार भागों की कल्पना वैदिक ऋषि के चिन्तन की पराकाष्ठा है ।२ वेद का यही
वाक्तत्त्व ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यात होकर पुनः औपनिषदिक विवेचन का आधार
बना । गोपथब्राह्मण में ३ शब्द के प्रकृतिप्रत्यय विभाग के सम्बन्ध में “ओंकारं
पृच्छामः । को धातुः, कि प्रातिपदिकं, कि नामाख्यातं, कि लिङ्गं, कि वचनं,
का विभक्तिः, कः प्रत्ययः इति” इस प्रकार के अनेक प्रश्न उठाये गये हैं । इन
समस्त प्रश्नों का समाधान भी किया गया । विषय के विशेषज्ञ वैयाकरण आचार्य
इस समय तक प्रसिद्ध हो गये थे, इसका उल्लेख भी यहीं मिलता है ४—“आख्यातो-
पसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च संस्थानाध्यायिन आचार्याः पूर्वे
बभूवुः ।” पाणिनि ने अपने शब्दानुशासन में अनेक वैयाकरणाचार्यों का उल्लेख
किया है । स्वयं महाभाष्य में भी ऐन्द्र व्याकरण की ओर संकेत है जिसमें
प्रतिपदपाठ की पद्धति से शब्दानुशासन किया गया था ।५
इस पूर्ववर्ती व्याकरणपरम्परा को उपजीव्य बनाकर महावैयाकरण
पाणिनि ने पदसाधुत्व के हेतु अष्टाध्यायी के रूप में सूत्र ग्रन्थ का निर्माण कर
वैदिक भाषा को संस्कृत किया । अनेक वैयाकरणों ने इन सूत्रों पर वार्त्तिकों
का निर्माण किया । वार्त्तिककारों में कात्यायन सर्वप्रमुख हैं । सुनाग का नाम भी
वार्त्तिककार के रूप में उपलब्ध होता है । पतञ्जलि का महाभाष्य इन्हीं वार्त्तिकों
१. यजुर्वेद १६.१७
२. (क) चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । —ऋग्वेद १।१६४।४५
(ख) चत्वारि शृङ्गा० ऋग्वेद ४।५८।३ इस मन्त्र पर महाभाष्य का व्याख्यान ।
३. गोपथब्राह्मण, प्रथम प्रपाठक १।२४
४. वही १।२७
५. बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां पारायणं प्रोवाच···।
बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता···। —महाभाष्यम्, पस्पशाह्निकम् ।

Page 8Permalink

( vi )
पर एक बृहद् व्याख्यान है, जिसे वस्तुतः पाणिनि व्याकरण के उत्कर्ष का चरम
कहा जा सकता है। दर्शन से नितान्त अस्पृष्ट अष्टाध्यायी के सूत्रों में दार्शनिकता
की गन्ध ढूंढकर उनका नये ढंग से व्याख्यान किया गया। भर्तृहरि ने इसे संग्रह
प्रतिकञ्चुक कहा है जो इस बात का प्रतीक है कि यह संग्रह के समान व्याकरण
का दार्शनिक ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से सरल होने पर भी यह भावगाम्भीर्य के
कारण दुर्बोध है। अपने प्रौढ पाण्डित्य, गम्भीर अर्थविवेचना और व्यापक
दृष्टि के कारण यह भाष्य ही नहीं, महाभाष्य कहा जाता है। इस प्रसङ्ग में
भर्तृहरि के—
कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना ।
सर्वेषां न्यायबीजानां महाभाष्ये निबन्धने ।। वाक्य २।४८५.
इस कथन पर पुण्यराज की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है—
“तच्च भाष्यं न केवलं व्याकरणस्य निबन्धनं यावत्सर्वेषां न्यायबीजानां बोद्धव्य-
मित्यत एव सर्व न्यायबीजहेतुत्वादेव महच्छब्देन विशिष्य महाभाष्यमित्युच्यते लोके ।”
कैय्यट की भी इस विषय में स्पष्ट उक्ति है—
पाणिनीयव्याख्यानभूतत्वेऽपि इष्ट्यादिकथनेन अन्वाख्यातृत्वादस्य इतर-
भाष्यवैलक्षण्येन महत्त्वम् ।।
खण्डनमण्डनात्मक शैली में वार्त्तिककारों के मतों का सूक्ष्म परीक्षण करते
हुए व्याख्यानमुखेन व्याकरण के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रतिपादन के साथ-साथ
विभिन्न शास्त्रों के सिद्धान्तों का भी यथास्थान निवेश हो गया है। यह भी इस
भाष्य के महत् विशेषण का हेतु है। इसी ग्रन्थ में बीज रूप से निर्दिष्ट विशेषण
के आधार पर आगे चलकर भर्तृहरि ने व्याकरण को दर्शनत्व की उच्च भूमि पर
आरूढ़ किया तथा नागेश और उसके टीकाकारों ने आगे चलकर इसे नव्यन्याय की
शैली पर प्रतिष्ठापित करने का गौरव प्राप्त किया किन्तु पतञ्जलि का वैशिष्ट्य
फिर भी बना रहा क्योंकि सरल से सरल भाषा में अत्यन्त दुरूह विषय को भी
संवादमयी सहज शैली में प्रस्तुत कर पाना पतञ्जलि के द्वारा ही सम्भव है। स्थान
स्थान पर प्रयुक्त होने वाली सूक्तियां और कहावतें भाषा और भावों को भी
जीवन्तता प्रदान करती हैं। “यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्” की कल्पना ने इनके
महत्त्व को और भी बढ़ा दिया जहाँ सूत्रकार और वार्त्तिककार की भी अपेक्षा से
भाष्यकार का मत अधिक प्रशस्त माना जाता है।
लोकव्यवहार में प्रचलित प्रयोगों को शास्त्र की सीमाओं में बाँधने के
लिए पतञ्जलि ने इष्टियों का निर्माण किया। प्रकारान्तर से यह इस बात का भी
प्रतीक है कि पतञ्जलि शास्त्र की अपेक्षा लोक को ही अधिक महत्त्व देते थे।
वैयाकरण तथा सूत के संवाद में जहाँ प्राप्ति और इष्टि की बात को उठाकर

Page 9Permalink

इष्टि को अधिक महत्त्वपूर्ण कहा गया है, वह प्रसङ्ग भी इसी तथ्य को पुष्ट करता
है। पतञ्जलि की यह मान्यता पश्चाद्वर्ती वैयाकरणों में भी इसी रूप में स्वीकार
हुई। महाकवि श्रीहर्ष ने भी इस बात को समर्थन देते हुए कहा है कि शश से
युक्त पदार्थ को शशी मानकर भी तदनुरूप मृग से युक्त पदार्थ को मृगी नहीं कहा
जाता क्योंकि यह प्रयोग लोक व्यवहार में स्वीकार्य नहीं हुआ—
भङ्क्तुं प्रभुर्व्याकरणस्य दर्पं पदप्रयोगाध्वनि लोक एषः ।
शशो यदस्यास्ति शशी ततोऽयमेवं मृगोऽस्यास्ति मृगीति नोक्तः ।।
नैषध०-२२।८४.
वाक्यपदीयकार के अनुसार कालान्तर में पतञ्जलि के शिष्यों बैजि, सौभव
और हर्यक्ष ने शुष्क तर्कपद्धति का आश्रय लेकर इस ग्रन्थ के महत्त्व को घटा
दिया,⁶ जिससे यह एक लम्बे समय तक लुप्त प्राय ही रहा। केवल ग्रन्थ रूप में यह
अस्तव्यस्त रूप में अवशिष्ट रहा। भर्तृहरि और कल्हण⁷ दोनों ने चन्द्राचार्य
को महाभाष्य का उद्धारक माना है। उसके बाद भर्तृहरि ने महाभाष्य पर 'त्रिपदी'
नाम की टीका लिखी। कैयट ने अपने महाभाष्य प्रदीप पर त्रिपदी का प्रभाव
स्वयं स्वीकार किया है। प्रदीप पर नागेशभट्ट ने उद्योत नाम का व्याख्यान लिखा ।
प्रदीपोद्योत पर वैद्यनाथ पायगुण्डे की छाया नाम की व्याख्या भी उपलब्ध
होती है जिस पर काशी विश्वविद्यालय के व्याकरणाचार्य पं० रुद्रधर झा ने
१९५४ में 'तत्त्वालोक' नाम की टीका लिखी है।
सम्पूर्ण महाभाष्य कुल ८५ आह्निकों में विभक्त है। 'आह्निक' शब्द का
अर्थ है—एक दिन में अधीत अंश । ग्रन्थ की शैली भी इसी प्रकार की है मानों
गुरु अपने शिष्यों को विद्याभ्यास करवा रहा हो। व्याकरण शास्त्र के मूल
सिद्धान्तों को सरलतम रूप में हृदयङ्गम कराने की दृष्टि से यह शैली अत्यन्त
आकर्षक, रोचक तथा उपयुक्त है।
पस्पशाह्निक इस विशाल ग्रन्थ का प्रथम आह्निक है जिसे वस्तुतः सम्पूर्ण
ग्रन्थ की प्रस्तावना कहा जा सकता है। 'पस्पश' शब्द प्रारम्भ अथवा उपोद्घात
के अर्थ में प्रयुक्त होता है। माघ के 'शिशुपालबधम्' में यह शब्द गुप्तचर के अर्थ
में भी प्रयुक्त हुआ है जहाँ श्लेष की सहायता से गुप्तचरों के बिना राज्य की
श्रीहीनता की उपमा पस्पशाह्निक के बिना शब्दविद्या की शोभाहीनता से की गई
है—"शब्दविद्येव नो भाति राजनीतिरपस्पशा ।" एवं च प्रकारान्तर से महाकाव्य
का यह प्रसङ्ग पस्पशाह्निक के महत्त्व को भी स्पष्ट कर पाने में कृतकार्य हुआ है।
६. बैजिसौभवहर्यक्षैः शुष्कतर्कानुसारिभिः ।
आर्षे विप्लावित ग्रन्थे सङ्ग्रहप्रतिकञ्चुके ॥ —वाक्य० २।४८७
७. राजतरङ्गिणी १।१७५

Page 10Permalink

( viii )

पस्पशा शब्द का महाकाव्यसम्मत अर्थ भी पस्पशाह्निक पर इस रूप में चरितार्थ
हो जाता है कि यहाँ भी वस्तुतः व्याकरणदर्शन के अनेक निगूढ़ प्रश्नों पर विचार
प्रस्तुत किया गया है।
व्याकरणशास्त्र लौकिक और वैदिक उभयविध शब्दों के साधुत्व का अनुशासन
करता है, अतः सर्वप्रथम शब्दस्वरूप पर विचार किया गया है। अखण्ड और नित्य
स्फोटरूप शब्दब्रह्म की संसिद्धि वैयाकरणों को अभीष्ट है। इसी मत की स्थापना के
निमित्त ही द्रव्य, गुण, क्रिया और जातिशब्दवादियों के सिद्धान्त को पूर्वपक्ष के रूप
में स्थापित कर उनका प्रत्याख्यान किया गया है। वह नित्य तत्त्व जो ध्वनि से
व्यक्त होता है तथा उच्चरित होने पर तत्तदर्थ का बोध करवाता है। वैयाकरणों
की दृष्टि में शब्द है। इसे ही स्फोट का नाम दिया गया है। यद्यपि लोकव्यवहार
की दृष्टि से ध्वनि में भी पतञ्जलि ने शब्दत्व स्वीकार किया ही है। इन्हीं ध्वनि-
रूप शब्दों का साधुत्व प्रतिपादन ही व्याकरणशास्त्र का विषय है।
तदनन्तर व्याकरणशास्त्र अथवा व्याकरणाध्ययन के मुख्य एवं गौण
प्रयोजनों का अन्वाख्यान किया गया है। वेदों की रक्षा के लिए तो व्याकरणाध्ययन
अनिवार्य है ही, आगम (शास्त्र) भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक है—
रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम् ।
आगमः खल्वपि। ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ।
इस विवेचन में पतञ्जलि के वेदविषयक पाण्डित्य का परिचय भी उपलब्ध
होता है, जहाँ अनेक वैदिक मन्त्रों को उद्धृत करके उनका व्याख्यान किया गया है।
“चत्वारि शृङ्गा०" इत्यादि मन्त्र का शब्दब्रह्म को लक्ष्य करके पतञ्जलि ने
मौलिक व्याख्यान प्रस्तुत किया है। इससे पूर्व यास्क ने इसी मन्त्र को यज्ञपुरुष के
रूप में व्याख्यात किया था। बाद में राजशेखर ने इसी मन्त्र की सहायता से
काव्यपुरुष के शरीर का निर्माण किया।
शब्दों का साधुत्वप्रतिपादन शब्दानुशासन शास्त्र का विषय है, “रक्षोहागम-
लघ्वसन्देहाः" इसके प्रयोजन । अधिकारी का निर्देश तेभ्य एव विप्रतिपन्न-
बुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः सुहृद्भूत्वाऽऽचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे, इस वाक्य के द्वारा हुआ
है। प्रमेय रूप शब्दज्ञान तथा साधन रूप शब्दानुशासन में परस्पर बोध्यबोधकभाव
सम्बन्ध है।
शास्त्र का विषयभूत यह शब्दोपदेश साधु शब्दों, असाधु शब्दों तथा साधु
और असाधु उभयविध शब्दों के उपदेश को लेकर भी किया जा सकता है। उभयविध
शब्दोपदेश की पद्धति में स्पष्टता और सरलता होते हुए भी यह गौरव दोष से
दूषित है, अतः इसे स्वीकार नहीं किया गया। अपशब्दोपदेश से भी साधु शब्दों का
का अनुमान किया जा सकता है। गावी, गोणी इत्यादि समस्त असाधु शब्दरूपों
को एक स्थान पर उल्लिखित देखकर उनसे व्यतिरिक्त एक साधु शब्द तक पहुँचाया

Page 11Permalink

(2) रिश्च (3)?
Wait, could it be a misprint in this edition?
Let's look at the typeset word in the image, letter by letter:

  • First letter: ल with left matra ि = 'लि'
  • Second letter: ङ् + ग = ङ्ग, with an e-matra on top = ङ्गे (or ङ्गै)
  • Third letter: it looks like 'इ' or 'र' with something?
    Wait! Look at the word:
    Could it be "लिङ्गैरिश्च"?
    Wait, why would there be "लिङ्गैरिश्च"?
    Wait, what if it's "लिङ्गेभिश्च"?
    Wait! Look at the letter:
    Could it be 'भ' in old Devanagari?
    In old Devanagari, 'भ' is NOT written like an S!
    What letter IS written like an S in Devanagari?
    'ड' (da)
    'इ' (i)
    'ह' (ha - top is S-like)
    Wait! What if the typesetter misread "लिङ्गैश्च"?
    How would "लिङ्गैश्च" be typeset?
    ल + ि = लि
    ङ्ग + ै = ङ्गै
    श + ् + च = श्च
    If it was just "लिङ्गैश्च", there would be:
    लि - ङ्गै - श्च.
    Three aksharas!
    Let's count how many aksharas are
Page 12Permalink

( x )
सहस्र वस्तुओं पर विचार किया था। द्रव्याभिधानवाद,८ वाक्यार्थवाद,६ शब्दप्रकृति-
अपभ्रंशवाद और नित्यशब्दत्ववाद व्याडि के मुख्य सिद्धान्त हैं।
शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध की नित्यता का ज्ञान लोकव्यवहार से होता
है। इसके समर्थन में पतञ्जलि ने एक सुन्दर आख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा है कि
घट प्रयोग की इच्छा करने वाला व्यक्ति जिस प्रकार से कुम्भकार के पास जाकर
घट का क्रय कर लेता है, उसी प्रकार से कोई शब्द प्रयोग के लिए वैयाकरण के पास
शब्द का क्रय करने नहीं जाता। लोकव्यवहार से ही शब्दार्थसम्बन्धों की नित्यता
सिद्ध होने पर भी शास्त्र के द्वारा उनका धर्मनियमन किया जाता है।
शब्दों का साधुत्व व्यवहार के आश्रित है अतः अन्वय-व्यतिरेक से जो शब्द
लोक में व्यवहृत नहीं होते, उनमें स्वतः ही असाधुत्व आ जाता है, परन्तु शास्त्र में
अनेक ऐसे शब्दों का भी अनुशासन होता है जो लोक व्यवहार में प्रचलित नहीं हैं,
अतः असाधु (लोक में अप्रचलित) शब्द का अनुशासन करने से शास्त्र अनिष्टानुशासन
से दूषित हो जायेगा परन्तु दीर्घकालीन शतवार्षिक और सहस्रवार्षिक यज्ञों के समान
इन शब्दों का अनुशासन भी धर्म मानकर अवश्यंकर्त्तव्य है। जिस प्रकार से आज इन
दीर्घकालीन यज्ञों को कोई नहीं कर सकता किन्तु फिर भी शास्त्र से उनका विधान
होता ही है, उसी प्रकार से अप्रयुक्त होने पर भी इनका अनुशासन दोषयुक्त नहीं है,
प्रत्युत आवश्यक है। और फिर शब्द प्रयोग के महान् विषयक्षेत्र को अनदेखा करके
किसी शब्द जो अप्रयुक्त नहीं कहा जा सकता। अतः शास्त्र में इस दोष की प्रसक्ति
की सम्भावना नहीं की जा सकती।
साधु शब्द अभ्युदय का हेतु है। असुर “हेलयो हेलयः” इस प्रकार कहते हुए
पराभव को प्राप्त हुए, यह इस बात का प्रतीक है कि केवल ज्ञानमात्र से नहीं प्रत्युत
साधु शब्द के प्रयोग से ही धर्म की प्राप्ति होती है किन्तु व्यवहार में यह धर्मनियमन
केवल याज्ञिक क्रियाओं में ही लागू होता है। यर्वाणः, तर्वाणः नामक ऋषियों का
प्रसङ्ग इस बात को पुष्ट करता है, जो ‘यद्वानः,’ ‘तद्वानः’ इन शब्दों के स्थान पर
असाधु यर्वाणः, तर्वाणः शब्दों का प्रयोग किया करते थे और इसीलिए उनका नाम
भी यर्वाणः, तर्वाणः पड़ गया था परन्तु याज्ञिक क्रियाओं में शुद्ध उच्चारण करने के
कारण वे दूषित नहीं हुए। तथापि सिद्धान्त रूप में श्रुति का अनुसरण करते हुए
८. (क) द्रव्याभिधानं व्याडिः । —महाभाष्य १।२।६४
(ख) वाजप्यायनस्याकृतिः । व्याडेस्तु द्रव्यम् । महाभाष्यदीपिका, पृ० ११
६. न हि किञ्चित्पदं नामरूपेण नियतं क्वचित् ।
पदानां रूपमर्थो वा वाक्यार्थादेव जायते ॥
—वाक्य० १।२४ की हरिवृत्ति में उद्धृत ।
१०. शब्दप्रकृतिरपभ्रंश इति संग्रहकारः । —वाक्य १।१४८ की हरिवृत्ति में ।

१. व्याकरण अध्ययन के मुख्य एवं गौण प्रयोजन (रक्षा, ऊह, आगम, लघु, असन्देह)

Page 13Permalink

( xi )
ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग का पक्ष भाष्यकार को अभिमत है । "योऽग्निष्टोमेन
यजते य उ चैनमेवं वेद" तथा "योऽग्निं नाचिकेतं चिनुते य उ चैनमेवं वेद" इत्यादि
श्रुतियाँ भी शास्त्र ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग में धर्म का नियमन करती हैं ।
अथवा ज्ञानमात्र से भी धर्मप्राप्ति की बात इसलिए स्वीकार्य हो सकती है कि अप-
शब्दज्ञान भी वस्तुतः शब्दज्ञान का एक उपाय ही है यद्यपि पाणिनीय तन्त्र में इस
पद्धति को नहीं अपनाया गया । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि कूपखनन में
जिस प्रकार से व्यक्ति पहले मृत्तिका से लिप्त होकर पश्चात् स्वच्छ जल में स्नान
कर पवित्र हो जाता है, उसी प्रकार अपशब्दज्ञान के अधर्म से दूषित हुआ व्यक्ति
साधु शब्दज्ञान के पुण्य को प्राप्त कर पुनः उस दोष से मुक्त होकर अभ्युदय को
प्राप्त कर सकता है । और फिर व्याकरणदर्शन तो शब्दप्रमाणवादी दर्शन है ।
आगम साधु शब्द के ज्ञान से धर्मप्राप्ति का निर्देश तो अवश्य करता है, अपशब्द से
अधर्म प्राप्ति की बात वहाँ नहीं कही गई—शब्दश्च शब्दज्ञाने धर्ममाह नापशब्द-
ज्ञानेऽधर्मम् ।
इसके अनन्तर व्याकरण शब्द के पदार्थ पर विचार किया गया है । सिद्धान्ती
के अनुसार लक्ष्य अर्थ और लक्षण सूत्र दोनों की युगपत् व्याकरण-संज्ञा है—लक्ष्य
लक्षणे व्याकरणम् । समुदाय में प्रवृत्त होने वाले शब्द उसके अवयवों में प्रयुक्त
होते हुए लोक में देखे जाते हैं, अत एव केवल सूत्रों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति
को भी 'वैयाकरण' कहते हैं । अथवा केवल सूत्र में भी व्याकरणत्व उत्पन्न हो सकता
है और इस पक्ष में व्याकरणस्य सूत्रम् इत्यादि प्रयोग राहोः शिरः आदि प्रयोगों
के समान व्यपदिष्ट माने जा सकते हैं । परन्तु केवल शब्द में व्याकरणत्व सिद्ध नहीं
किया जा सकता क्योंकि ऐसा मानने पर भव और प्रोक्तादि अर्थों में तद्धित प्रत्यय
निष्पन्न नहीं हो पायेंगे ।
इस सूत्ररूप व्याकरणशास्त्र में लाघव से प्रवृत्ति के लिए प्रारम्भ में वर्णों का
उपदेश किया गया है यद्यपि साक्षात् किसी साधु शब्द का अनुशासन इससे नहीं
होता । इसके अतिरिक्त अनुबन्धों का बोधन तथा इष्ट वर्णों का उपदेश भी वर्णो-
पदेश के प्रयोजन हैं । इष्ट वर्णों के विशेष बोध में एक वर्ण का उपदेश करने से ही
उसके अन्य आकृतिरूपों का ग्रहण स्वयं हो जाता है । यथा उपदिश्यमान अकार अपने
अन्य दीर्घ, प्लुत, उदात्तादि सभी रूपों का ग्रहण करवाता है परन्तु इस आकृतिग्रहण
में संवृत, ध्मात आदि स्वर और व्यंजन दोषों का ग्रहण इष्ट नहीं है क्योंकि आचार्य
ने आगम, विकार, धातु प्रत्यय आदि सभी को शुद्ध रूप में पढ़ा है—
आगमाश्च विकाराश्च प्रत्ययाः सह धातुभिः ।
उच्चार्यन्ते ततस्तेषु नेमे प्राप्ताः कलादयः ॥

Page 14Permalink

( xii )
अथवा दुर्जनतोषणन्याय से यदि इन दोषों का ग्रहण मान भी लिया जाये तो
गर्गादि, विदादि पाठों से इन दोषों की निवृत्ति हो सकती है। गर्गादि गणपाठों के दो
प्रयोजन हैं। ये समुदायों का साधुत्व तो बनाते ही हैं, कलादि की निवृत्ति भी करते
हैं, परन्तु इन दोषों को अनुबन्धों के स्थान पर लिङ्ग स्वीकार करने से यद्यपि इत्संज्ञा,
लोप आदि की दीर्घ शास्त्रीय प्रक्रिया से बचा अवश्य जा सकता है परन्तु यह व्यवस्था
अपाणिनीय है, इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। अपि च ऐसा होने पर शास्त्र
अशिष्टानुशासन के दोष से दूषित हो जायेगा, जो सर्वथा अभीष्ट नहीं है।

Page 15Permalink

श्रीः
महाभाष्यम्
पस्पशाह्निकम्
सर्वाकारं निराकारं विश्वाध्यक्षमतीन्द्रियम् ।
सदसद्रूपतातीतमदृश्यं माययावृतैः ॥१॥
ज्ञानलोचनसंलक्ष्यं नारायणमजं विभुम् ।
प्रणम्य परमात्मानं सर्वविद्याविधायिनम् ॥२॥
पुरुषाः प्रतिपद्यन्ते देवत्वं यदनुग्रहात् ।
सरस्वतीं च तां नत्वा सर्वविद्याधिदेवताम् ॥३॥
पदवाक्यप्रमाणानां पारं यातस्य धीमतः ।
गुरोर्महेश्वरस्यापि कृत्वा चरणवन्दनम् ॥४॥
महाभाष्यार्णवावारपारीणं विवृतिप्लवम् ।
यथागमं विधास्येऽहं कैयटो जैयटात्मजः ॥५॥
भाष्याब्धिः क्वातिगम्भीरः क्वाहं मन्दमतिस्ततः ।
छात्राणामुपहास्यत्वं यास्यामि पिशुनात्मनाम् ॥६॥
तथापि हरिबद्धेन सारेण ग्रन्थसेतुना ।
क्रममाणः शनैः पारं तस्य प्राप्तास्मि पङ्गुवत् ॥७॥
मूलम्—अथेत्ययं शब्दोऽधिकारार्थः प्रयुज्यते । शब्दानुशासनं नाम शास्त्रमधि-
कृतं वेदितव्यम् । केषां शब्दानाम् ? लौकिकानां वैदिकानां च । लौकिकास्तावत्—
गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इति । वैदिकाः खल्वपि—शन्नो
देवीरभिष्टये, इषे त्वोर्जे त्वा, अग्निमीळे पुरोहितम्, अग्न आयाहि वीतय इति ।
प्रदीपः—भाष्यकारो विवरणकारत्वाद् व्याकरणस्य साक्षात्प्रयोजनमाह—
अथ शब्दानुशासनमिति । प्रयोजनानि तु रक्षोहादीनि पश्चाद्वक्ष्यति । स्ववाक्यं
व्याख्यातुं तदवयवमथशब्दं तावद् व्याचष्टे—अथेत्ययमिति । इतिशब्दोऽथशब्दस्य
स्वरूपेऽवस्थापनाय प्रयुक्तः । एवं हि पदान्तरैः सामानाधिकरण्येन सम्बन्धे
सत्यथशब्दो व्याख्यातुं शक्यते । स्वरूपेऽवस्थितश्च सर्वनाम्ना परामृश्यते—अयमिति ।
शब्द इति स्वरूपकथनं विस्पष्टप्रतिपत्त्यर्थम् । अधिकारार्थ इति । अधिकारः प्रस्तावो
द्योत्यत्वेनास्य प्रयोजनमित्यर्थः । निपातानां च द्योतकत्वं वाक्यपदीये निर्णीतम् ।
अथशब्दस्याधिकारार्थत्वे यो वाक्यार्थः सम्पद्यते तं दर्शयति—शब्दानुशासनमिति ।

Page 16Permalink

२ महाभाष्यम्
अनेकक्रियाविषयस्यापि शब्दानुशासनस्य प्रारभ्यमाणताऽथशब्दसन्निधानेन प्रतीयते ।
व्याकरणस्य चेदमन्वर्थं नाम — शब्दानुशासनमिति । अत्र चाचार्यस्य कर्तुः
प्रयोजनाभावाननुपादानादुभयप्राप्त्यभावान्नोभयप्राप्तौ कर्मणीत्यनेन षष्ठी, अपितु
कर्तृकर्मणोः कृतीत्यनेनेति कर्मणि चेति समासप्रतिषेधप्रसङ्गादिध्मप्रव्रश्च-
नादिवत्समासः ।
शब्दशब्दस्य सामान्यशब्दत्वाद् विना प्रकरणादिना विशेषेऽवस्थानाभावात्तन्त्री
शब्दकाकवाशितादीनामप्यनुशासनप्रसङ्ग इति मत्वा पृच्छति — केषामिति । उत्तर-
पदार्थान्तर्गतस्यापि पूर्वपदार्थस्य बुद्ध्या प्रविभागात्किमा प्रत्यवमर्शः । यथा राजपुरुष
इत्युक्ते "कस्य राज्ञः" इति ।
सिद्धान्तवादी तु व्याकरणस्य वेदाङ्गत्वात्सामर्थ्याद्विशेषावगतिरिति
मत्वाह — लौकिकानामिति । लोके विदिता इति — लोकसर्वलोकाट्ठञिति ठञ् ।
अथवा भवार्थेऽध्यात्मदित्वाट्ठञ् । एवं वेदे भवा वैदिकाः । वैदिकानां लौकिकत्वेऽपि
प्राधान्यख्यापनाय पृथगुपादानम् । यथा — ब्राह्मणा आयाता वसिष्ठोऽप्यायात इति
वसिष्ठस्य । तेषां तु प्राधान्यं यत्नेनापभ्रंशपरिहारात् । अथवा भाषाशब्दानामेव
लौकिकत्वमिति भेदेन निर्देशः । तत्र लोके पदानुपूर्वीनियमाभावात्पदान्येव दर्शयति —
गौरश्व इति । वेदे त्वानुपूर्वीनियमाद्वाक्यान्युदाहरति — शं न इति ।
अनुवाद — अब ‘शब्दानुशासन’ प्रारम्भ होता है ।
‘अथ’ यह शब्द ‘प्रारम्भ’ अर्थ में प्रयुक्त किया गया है । “शब्दानुशासन”
नाम का शास्त्र प्रारम्भ हुआ जानना चाहिए । किन शब्दों का ? लौकिक और
वैदिक (शब्दों) का । लौकिक, यथा — गौः, अश्वः, पुरुषः, हस्ती, शकुनिः, मृगः,
ब्राह्मणः इत्यादि । वैदिक भी, यथा — शन्नो देवीरभिष्टये, इषे त्वोर्ज्जे त्वा,
अग्निमीळे पुरोहितम्, अग्न आयाहि वीतये इत्यादि ।
उषा — प्रदीपकार कैयट ने “अथ शब्दानुशासनम्” को भाष्यकार का वचन
माना है । ततश्च स्वप्रोक्त पदों का व्याख्यान करते हुए ‘अथ’ शब्द का अधिकारार्थ
में नियमन है । अपरत्र काशिकाकार उसे सूत्रकार का वचन मानते हैं और काशिका
व्याख्या के आदि में पढ़कर उसका व्याख्यान करते हैं । यह देखते हुए कि “शब्दा-
नुशासनम्” पाणिनिकृत व्याकरणग्रन्थ का अभिधान है, इसे अष्टाध्यायी का आदिम
सूत्र माना जा सकता है । स्वयं पतञ्जलि ने भी “शब्दानुशासनं नाम शास्त्रम्”
कहकर उसकी शब्दानुशासन संज्ञा स्वीकार की है । अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर
पतञ्जलि ने श्रुतिमन्त्रों अथवा आप्तवाक्यों को उद्धृत कर उनका व्याख्यान
किया है ।
वस्तुतः शब्दानुशासन व्याकरणशास्त्र का अन्वर्थ नाम है । व्याकरणशास्त्र
का सर्वप्रमुख प्रयोजन ही शब्दों का अनुशासन है । शब्दों से यहाँ अभिप्राय साधु

Page 17Permalink

प्रथममाह्निकम् (पश्पशा) ३
शब्दों से है क्योंकि साधु शब्द के प्रयोग से ही धर्म की प्राप्ति होती है और अधर्म-
कारक असाधु शब्दों का व्याख्यान करके शास्त्र अनिष्टानुशासन के दोष से दूषित
हो जायेगा और फिर साधु शब्दों के व्याख्यान में लाघव भी है ।
मेदिनीकोश में ‘अथ’ शब्द के संशय, अधिकार, मंगल, विकल्प, आनन्तर्य,
प्रश्न, कार्त्स्न्य, आरम्भ और समुच्चय रूप ६ अर्थ बताये गये हैं—(अथायो संशये
स्यातामधिकारे च मङ्गले । विकल्पानन्तरप्रश्नकात्स्न्र्यारम्भसमुच्चये ।।) यहाँ यह
निपात 'आरम्भ' अर्थ का द्योतक है । इति शब्द का प्रयोग ‘अथ’ शब्द के स्वरूपा-
वस्थान के लिये है ।
"शब्दानुशासनम्" में “कर्तृकर्मणोः कृति" इस सूत्र से षष्ठी प्राप्त है ।
'कर्मणि च" सूत्र से समास का निषेध न होकर “इध्मप्रव्रश्चनः” आदि की तरह
समास का रूप निष्पन्न होगा ।
शास्त्र का लक्षण है—“प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा । पुंसां
येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते" ।। व्याकरण में भी साधुशब्दप्रयोग में प्रवृत्ति
तथा असाधु शब्दप्रयोग में निवृत्ति का उपदेश किया जाता है, अतः व्याकरण भी
शास्त्र है ।
'शब्दानुशासनम्' समस्त पद है, अतः "पदार्थः पदार्थानन्वेति न तु तदेकदे-
शेन" इस नियम से समस्त पद के एकभाग 'शब्द' शब्द से सम्बद्ध प्रश्न “केषां
शब्दानाम्" भी उपपन्न नहीं हो सकता । तथापि भाष्यकार के ही इसी प्रकार के
अन्य प्रयोगों—“राजपुरुषोऽयम् । कस्य राज्ञः ?" इत्यादि को देखकर इसका भी
सामञ्जस्य किया जा सकता है ।
यद्यपि सिद्धान्तरूप में शब्द एक ही है और उसके समस्त जागतिक
आकार अनित्य हैं, तथापि लोक में क्योंकि उन्हीं से अर्थबोध होता है और व्याकरण
में भी उन्हीं के साधुत्व का अनुशासन किया जाता है, अतः लौकिक प्रयोग को
दृष्टि में रखकर यहाँ बहुवचन का निर्देश किया गया है । इसीलिए व्याकरण को
आञ्जस (तामस, अन्धकारपूर्ण) मार्ग भी कहा गया है ।
वैदिक शब्द भी यद्यपि लोक में ही हैं तथापि प्रधान होने के कारण ब्राह्मण-
वशिष्ठ न्याय से उनका पृथगुपादान किया गया है । अथवा लोकभाषा में प्रयुक्त
शब्दों को लौकिक और वेद में प्रयुक्त शब्दों को वैदिक कहकर भी इस कथन का
सामञ्जस्य किया जा सकता है । वेदवाक्यों में पदानुपूर्वी नियत है । मीमांसा का
स्पष्ट अभिमत है कि विशिष्ट क्रम में मन्त्रों का पाठ करने से अभ्युदय की प्राप्ति
होती है । इसीलिए वैदिक शब्दों को मन्त्रस्थ क्रम में ही पढ़ा गया है, लौकिक
शब्दों को स्वतन्त्र रूप से पृथक् पृथक् करके पढ़ दिया गया ।
मूलम् — अथ गौरित्यत्र कः शब्दः । कि यत्तत्सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषा-
ण्यथंरूपं स शब्दः । नेत्याह । द्रव्यं नाम तत् ।

Page 18Permalink

४ महाभाष्यम्
यत्तर्हि तदिङ्गितं चेष्टितं निमिषितमिति स शब्दः । नेत्याह । क्रिया नाम
सा ।
यत्तर्हि तच्छुक्लो नीलः कपिलः कपोत इति स शब्दः । नेत्याह । गुणो
नाम सः ।
यत्तर्हि तद्भन्नेष्वभिन्नं छिन्नेष्वच्छिन्नं सामान्यभूतं स शब्दः । नेत्याह ।
आकृतिर्नाम सा ।
कस्तर्हि शब्दः । येनोच्चारितेन सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाणिनां सम्प्रत्ययो
भवति स शब्दः ।
अथवा प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द इत्युच्यते । तद्यथा—शब्दं
कुरु, मा शब्दं कार्षीः, शब्दकार्ययं माणवक इति ध्वनिं कुर्वन्नेवमुच्यते । तस्माद्
ध्वनिः शब्दः ।
प्रदीपः-अयं गौरयं शुक्ल इति शब्दार्थयोरभेदेन लोके व्यवहारदर्शनाच्छब्द-
स्वरूपनिर्धारणाय पृच्छति—अथेति । गौरिति विज्ञाने प्रतिभासमानेषु वस्तुषु कः
शब्द इत्यर्थः । तान्येव वस्तूनि क्रमेण निर्दिशति । किं यत्तदिति । उद्दिश्यमानप्रति-
निर्दिश्यमानयोरेकत्वमापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तल्लिङ्गमुपाददत इति काम-
चारतः स शब्द इति पुंल्लिङ्गेन निर्देशः । नेत्याहेति । भिन्नेन्द्रियग्राह्यत्वान्न द्रव्यं
शब्द इति प्रतीतम्, अपि तु द्रव्यमिति । यदि च द्रव्यानुशासनं, विवक्षितमभविष्यद्
“अथ द्रव्यानुशासन” मित्येवावक्ष्यत् ।
अनेनैव न्यायेन गुणक्रियासामान्यानां निराकृतेऽपि शब्दत्वे प्रपञ्चार्थं तच्चोद्य-
पूर्वकं निराकरोति यत्तर्हीति । गोशब्दार्थे चैषां सम्भवाच्छब्दत्वमाशङ्कते । परि-
हारस्तु पूर्ववत् । तत्रेङ्गितमभिप्रायस्य सूचकः शरीरव्यापारः । चेष्टितं कायपरिस्पन्दः ।
निमिषितमक्षिव्यापारः ।
शुक्लो नील इति । द्रव्यस्य प्रागुपन्यासाद्गुणमात्राभिधायिनोऽत्र शुक्लादयो
द्रष्टव्याः ।
भिन्नेष्वभिन्नमिति । अनेन सामान्यस्यैकत्वं कथ्यते । छिन्नेष्वच्छिन्नमिति ।
अनेन तु नित्यत्वम् । सामान्यभूतमिति । सत्तारूपं महासामान्यं गोत्वादेः सामान्य-
विशेषस्योपमानं निर्दिष्टम् । सामान्यमिव सामान्यभूतम् । भूतशब्द उपमार्थे, यथा—
पितृभूत इति ।
द्रव्यादिषु निरस्तेषु पृच्छति—कस्तर्हीति । उत्तरमाह—येनोच्चारितेनेति ।
वैयाकरणा वर्णव्यतिरिक्तस्य पदस्य वाक्यस्य वा वाचकत्वमिच्छन्ति । वर्णानां
प्रत्येकं वाचकत्वे द्वितीयादिवर्णोच्चारणानर्थक्यप्रसङ्गात् । आनर्थक्ये तु प्रत्येकमुत्पत्ति-
पक्षे यौगपद्येनोत्पत्त्यभावात्, अभिव्यक्तिपक्षे तु क्रमेणैवाभिव्यक्त्या समुदायाभावादेक-
स्मृत्युपारूढानां वाचकत्वे सरो रस इत्यादावर्थप्रतिपत्तिविशेषप्रसङ्गात्तद्व्यतिरिक्तः

Page 19Permalink

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५
स्फोटो नादाभिव्यङ्ग्यो वाचको विस्तरेण वाक्यपदीये व्यवस्थापितः । उच्चारितेन ।
प्रकाशितेनेत्यर्थः ।
अथवेति । अन्यत्र ध्वनिस्फोटयोर्भेदव्यवस्थापितत्त्वादिहाभेदेन व्यवहारेऽपि न
दोषः, द्रव्यादयो न शब्दशब्दवाच्या इत्यत्र तात्पर्यात् । ध्वनिं कुर्वन्निति । विधि-
निषेधयोरप्रवृत्तविषयत्वात्कथमस्य त्रिभिः सम्बन्धः । उच्यते—शब्दं कुर्वन्नपि शब्दं
कुर्वित्युच्यते विरामाशङ्कायां तन्निवृत्तये । तथानभिमतशब्दश्रवणोद्वेजितेनोच्यते—
मा शब्दं कार्षीरिति ।
अनुवाद—सम्प्रति "गौः" इसमें क्या शब्द है ? क्या वह, जो सास्ना
(गलकम्बल), पूंछ, ककुद (कूब), खुर और सींग वाला पदार्थ है, वह शब्द है ?
'नहीं' यह (वैयाकरण) कहता है । वह तो द्रव्य है ।
तो क्या जो (उसके) शरीरव्यापार, कायपरिस्पन्द और अक्षिव्यापार हैं;
वह शब्द है ? 'नहीं' ऐसा (वैयाकरण) कहता है । वह तो क्रिया है ।
तो जो वह (तद्गत) शुक्ल, नील, कपिल और कपोत (वर्ण) है, वह शब्द
है ? वैयाकरण कहता है—"नहीं, वह तो गुण है ।"
तो जो वह भिन्न (पदार्थों) में भी अभिन्न, (पदार्थों के) नष्ट हो जाने पर
भी नित्य रहने वाला सामान्यभूत (जातितत्त्व) है, वह शब्द है । वैयाकरण कहता
है, "नहीं, वह तो आकृति (जाति) है ।"
तो शब्द क्या है ? (उत्तर) जिसके उच्चारण करने से (नादाभिव्यक्त
होने से) सास्ना लाङ्गूल ककुद खुर और सींग वाले पदार्थ का बोध होता है, वह
शब्द है ।
अथवा लोक में जिससे अर्थ का बोध होता है, वह ध्वनि 'शब्द' कही
जाती है । जैसे ध्वनि करने वाले बालक को उद्देश्य करके 'शब्द करो', 'शब्द मत
करो', यह बालक शब्दकारी (शोर करने वाला) है, ऐसा कहा जाता है । इसलिए
(लोकव्यवहार में) ध्वनि शब्द है ।
उषा—"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" इत्यादि श्रुतिवाक्यों तथा "वृद्धिरादैच्"
इत्यादि स्मृतिवाक्यों में शब्द और अर्थ का अभेद रूप में प्रतिपादन है । लौकिक
व्यवहार में भी "अयं गौः" इत्यादि वाक्यों में गो शब्द और गो अर्थ का अभेदेन
प्रयोग होने से द्रव्य में शब्दत्व की शङ्का उत्पन्न होती है । न केवल द्रव्य और
शब्द का ही, बल्कि द्रव्याश्रित जाति, गुण, क्रिया का भी द्रव्य के साथ अभेद होने
के कारण परम्परा से शब्द के साथ अभेद सिद्ध होता है । इसलिए शब्दानुशासन
से पूर्व शब्द के स्वरूप पर विचार करते हुए भाष्यकार ने "अथ गौरित्यत्र कः
शब्दः" इस प्रश्न को उठाया है और सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाण्यर्थरूप गुण
तथा सामान्यभूत जाति को पूर्वपक्ष के रूप में उठाकर उनका शब्दत्वेन निषेध
किया है ।

Page 20Permalink

६ महाभाष्यम्
व्याकरणमत में न तो प्रत्येक वर्ण को ही वाचक माना जाता है, न वर्णों
के समूह को। घट आदि शब्दों में यदि घटादि प्रत्येक वर्ण को ही वाचक मान
लिया जाये तो अन्य वर्णों में, जिनके समूह से पद बना है—टकारादि में वैयर्थ्य
प्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा। वर्ण समुदाय भी उच्चरित प्रध्वंसी स्वभाव वाला होने
के कारण अर्थ का वाचक नहीं हो सकता क्योंकि पूर्वापरता परस्पर सापेक्ष होती
है और एक वर्ण के नष्ट हो जाने पर दूसरे वर्ण से सापेक्षता की कल्पना नहीं की
जा सकती। नैयायिक तो क्योंकि शब्द को ही अनित्य मानता है, अतः वर्णों की
सत्ता ही जब नष्ट हो जाती है तो उनमें व्यवधानरहित उत्तरकालीनता के सम्बन्ध
की कल्पना सम्भव नहीं। पूर्व पूर्व वर्ण के संस्कार की कल्पना इसलिए उचित नहीं
कि संस्कार के विशिष्ट क्रम को निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता। नदी और
दीन तथा सर और रस आदि के समान इस प्रकार का क्रम विपर्यय लोकव्यवहार
में निश्चय ही अनभीष्ट है।
इसलिए वैयाकरणों के अनुसार द्रव्य, गुण, क्रिया, जाति आदि से भिन्न
एक स्वतन्त्र सत्ता है, जिसके उच्चारण से सास्नादिमत्पदार्थ का बोध होता है।
कैयट और नागेश यहाँ स्फोट तत्त्व का विवेचन करते हैं जो नित्य है और ध्वनि के
द्वारा अभिव्यक्त होता है। शब्द का उपकारक होने के कारण ध्वनि में शब्दत्व
का आरोप होता अवश्य है, वस्तुतः वह शब्द नहीं। स्फोट ही वास्तविक शब्द है।
वर्णरूप मध्यमानाद से अभिव्यक्त होकर वह वर्णस्फोट पदरूप मध्यमानाद से
अभिव्यक्त होकर पदस्फोट और वाक्यरूप मध्यमानाद से अभिव्यक्त होकर वाक्य-
स्फोट कहलाता है। वस्तुतः ये सब भेद भी घटाकाश और मठाकाश की तरह
औपाधिक हैं, वास्तविक नहीं। वर्ण और पद एक स्वतन्त्र और पूर्ण ध्वनि तो हो
सकते हैं, स्वतन्त्र अर्थ नहीं हो सकते। अतः कौण्डभट्ट के अनुसार आठ
प्रकार के स्फोटों में से वाक्य स्फोट ही मुख्य है, क्योंकि उसी से लोक में अर्थबोध
देखा जाता है।
लोक में प्रचलित ध्वनि को भी पतञ्जलि ने शब्द के रूप में स्वीकार किया
है। लोक में 'शब्द' शब्द से ध्वनि अर्थ ही समझा जाता है, इसीलिए “शब्दं कुरु",
“मा शब्दं कार्षीः" इत्यादि प्रयोग उपपन्न होते हैं। भर्तृहरि ने भी आगे चलकर
प्रत्येक वाचक शब्द में दो शब्दों (स्फोट और ध्वनि) की सत्ता को स्वीकार किया
था तथापि भर्तृहरि के ही शब्दों में ध्वनि शब्द का प्रयोजन स्फोट शब्द को अभि-
व्यक्त मात्र करना ही है। पतञ्जलि ने भी अन्यत्र महाभाष्य में ही ध्वनि को शब्द
का गुण कहा है—"एवं तर्हि स्फोटः शब्दः, ध्वनिः शब्दगुणः"। परापश्यन्ती-
मध्यमावैखरीरूप वाणी के चार विभागों में से यहाँ ध्वनिपद से वैखरी तथा स्फोट
पद से मध्यमावस्थास्थ आन्तर शब्द का ग्रहण होता है।
मूलम् — कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि ? रक्षोहागमलध्वसन्देहाः
प्रयोजनम् ।