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विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री

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DevanagariSanskritpublished493 pages

Page 451 of 493

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Page 451

( ४४८ )

या चाबुक के अग्रभाग को हिलाने वाला दक्षिण वायु, कामदेव की आज्ञा
से, वियोगी और वियोगिनिओ पर शासन करने के लिए तयार हो गया।
गाड़ी के बैल को हांकने के लिये चाबुक और चाबुक के दण्डे में एक काँटा
भी लगा रहता है जिससे गाड़ीवान बैलों को ठीक चलाता है। उसी प्रकार
वियोगी और वियोगिनिओ पर अपना शासन चलाने के लिए काम की आज्ञा
से वसन्तऋतु पलाश का फूल रूपी कांटा और लता रूपी चाबुक लेकर, तयार
हो गया।
प्रसूननाराचपरम्पराभिर्वर्षत्सु योधेष्विव पादपेषु ।
वसन्तमत्तद्विरदाधिरूढः प्रौढत्वमाप स्मरभूमिपालः ॥५३॥
अन्वयः
योधेषु इव पादपेषु प्रसूननाराचपरम्पराभिः वर्षत्सु (सत्सु) वसन्त-
मत्तद्विरदाधिरूढः स्मरभूमिपालः प्रौढत्वम् आप।
व्याख्या
योधेषु भटेष्विव 'भटा योधाश्च योद्धारः' इत्यमरः। पादपेषु वृक्षेषु प्रसूनानि
पुष्पाण्येव नाराचाः प्रक्ष्वेडना लोहनिर्मितशरास्तेषां परम्परास्ताभिः प्रसूननाराच
परम्पराभिर्वर्षत्सु पुष्पबाणधाराः पातयत्सु सत्सु, पादपेभ्यः पुष्पेपु पतत्स्विति-
भावः । वसन्त एव मत्तो मदान्धो द्विरदो गजस्तमधिरूढोऽधिष्ठितः स्मरः काम
एव भूमिपालो राजा प्रौढत्वं प्रकर्षमौन्नत्यमित्यर्थं । आप प्राप । पुष्पोद्गमेन
बसन्ते कामस्य प्रभावः प्रसृत इति भावः ।
भाषा
योधाओ के समान वृक्षो के पुष्परूपी लोहे के बाणो की वृष्टि करते रहने
पर अर्थात् अत्यधिक फूलो के उत्पन्न होकर नीचे गिरते रहने पर वसन्त रूपी
मदोन्मत्त हाथी पर सवार कामरूपी राजा उन्नत अवस्था को प्राप्त हुआ अर्थात्
काम का साम्राज्य चारो ओर फैल गया।
समर्प्यमाणाद्भूतेकौसुमास्त्र-श्चैत्रेण चित्रीकृतकाननेन ।
अधिज्यधन्वापि पराङ्मुखोऽभून्निषङ्गभारे भगवाननङ्गः ॥५४॥