विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री
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भाषा
उसके भुजबल ने चोलराजाओं के अन्त पुर की दरबानी, चञ्चल पूंछ रूपी
दण्डे को धारण करने वाले सिंहों को सौंप दी । अर्थात् उस नगर से सब
मनुष्यों के भाग जाने पर नगर के वीरान जंगल हो जाने से उसके अन्त पुर को
गुफा समझ उसमें शेर रहने लगे ।
चिन्तया दुर्बलं देहं द्रविड़ो यत्पलायितः ।
संकटाद्रिदरीद्वार-प्रवेशे बहुमन्यत ॥२६॥
अन्वयः
यत्पलायितः द्रविड़ः संकटाद्रिदरीद्वारप्रवेशे चिन्तया दुर्बलं देहं बहु
अमन्यत ।
व्याख्या
यस्माद्विक्रमाङ्कदेवात्पलायित समराङ्गण स्वगृहञ्च परित्यज्य द्रुतगति-
मवलम्ब्य प्रधावितो द्रविड़ो द्रविड़देशनृप संकट सवाधमल्पावकाशमित्यर्थ ।
‘संकट नातु सबाध’. इत्यमरः । यदद्रे पर्वतस्य दरीणा कन्दराणा ‘दरी तु
कन्दरो वा स्त्री’ इत्यमरः । द्वार ‘स्त्री द्वार्द्वार प्रतीहार’ इत्यमरः । तस्य
प्रवेशस्तस्मिन् पर्वतकन्दराणामल्पावकाशद्वारप्रवेशे चिन्तया पराजयचिन्तया
दुर्बल सामर्थ्यहीनमत एव कृश देह शरीर बहुमन्यत प्रशंसितवान् । शरीरस्य
स्थूलत्वेऽल्पावकाशाद्रिदरीद्वारे प्रवेशाभावे स्वसंरक्षणमसम्भवमिति स्वकृशत्वं
प्रशंसितवानिति भावः ।
भाषा
विक्रमाङ्कदेव के भय से घर दुवार छोड़ कर भागा हुआ द्रविड़ देश का
राजा, पर्वत की कन्दराओं के सकुचित द्वार में (छिपने के लिये) घुसने योग्य,
चिन्ता से कृश भये हुए अपने शरीर की बहुत प्रशंसा करने लगा । अर्थात्
शरीर स्थूल होने से वह उस कन्दरा में न घुस सकता और उसको छिपने का
अवसर न मिलता । इसलिये अपने दुबले पतले शरीर की सराहना करने लगा ।
दृश्यन्तेऽद्यापि तद्भीति-विद्रुतानां द्रुमालिषु ।
१अलकाश्चोलकान्तानां कर्पूरतिलकाङ्किताः ॥२७॥
१ अलिका इत्यपि पाठभेद ।