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विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

by महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री

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DevanagariSanskritpublished493 pages

Page 165 of 493

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Page 165

( १४० )
मात्सर्यं वहति स्मेति भावः । उक्तञ्च 'प्रकृतिः खलु सा महीयसां सहते
नान्यसमुन्नतिं ययेति' ।
भाषा
रानी क्रोध से अपनी भौंहें उठा कर शब्द करने वाले आभूषणों को भी
देखती थी और तेज से अपनी जोत रूपी मस्तक को ऊपर स्थिर रखने वाले
घर के दीपो से भी ईर्ष्या करती थी । अर्थात् मेरे सामने इन भूषणो की
बोलने की हिम्मत कैसी और इन तेजस्वी दीपो को बिना सिर झुकाए मेरे
सामने ठहरने की हिम्मत कैसी-ऐसी वीर रस की, दोहदजनित भावनाएँ
उस रानी के मन में होती थी ।
इति स्फुरच्चारुविचित्रदोहदा निवेदयन्ती सुतमोजसां निधिम् ।
प्रतिक्षणं सा हरिणायतेक्षणा दृशोः सुधावर्तिरभून्महीभुजः ॥७७॥
अन्वयः
इति स्फुरच्चारुविचित्रदोहदा सुतम् ओजसां निधिं निवेदयन्ती हरिणा-
यतेक्षणा सा प्रतिक्षणं महीभुजः दृशोः सुधावर्तिः अभूत् ।
व्याख्या
इतीत्थं पूर्वोक्तरीत्या स्फुरत्प्रकाशितञ्चारुशोभनं विचित्रमसाधारणचम-
त्कारि दोहदं गर्भिणीच्छा 'दोहदं गर्भिणीच्छायामिच्छामात्रेऽपि दोहदम्' यस्या सा
सुतं पुत्रमोजसां बलानां 'ओजो दीप्तौ बले' इत्यमरः । निधिं निधानं निवेदयन्ती
विज्ञापयन्ती हरिण इव मृग इवाऽऽयते विस्तीर्णे ईक्षणे नेत्रे यस्या सा मृगायतनयना
राज्ञी प्रतिक्षणं क्षणे क्षणे महीभुजो नृपस्य दृशोर्नयनयोः सुधावर्तिः सुखसमर्पका
पीयूषशलाकाऽभूत् । राज्ञी पीयूषशलाकावन्नृपस्य नेत्रयोरानन्दसमर्पकाऽभूदिति
भावः । अत्र रूपकालङ्कारः ।
भाषा
उपर्युक्त प्रकार से मनोहर और आश्चर्यजनक दोहदो से युक्त, (अतएव)
अपने पुत्र को बल का निधान सिद्ध करती हुई, मृग के समान बड़े बड़े नेत्र
वाली रानी, आँखों की अमृताञ्जन की शलाका के ऐसा राजा को, प्रतिक्षण
आनन्द देती थी । अर्थात् एसी अपनी रानी को देख कर राजा को प्रतिक्षण
आनन्द होता था ।