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सर्वकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

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DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

( १२६ )
भाषा
इसके अनन्तर उस गुणी राजा ने उत्कट आनन्द जनित अश्रुओं से भरी
आंखो से धन्य स्त्रियो में अग्राण्य गुणों से युक्त तथा आनन्द से निर्निमेष नेत्र
कमल वाली अपनी रानी की सान्त्वना की ।
शनैर्विधाय व्रतपारणाविधिं धनैः कृतार्थीकृतविप्रमण्डलः ।
अखण्डसौभाग्यविलासया पुनस्तया समं राज्यसुखेष्वरज्यत ॥५६॥
अन्वयः
(सः) शनैः व्रतपारणाविधि विधाय धनैः कृतार्थीकृतविप्रमण्डलः
(सन् ) अखण्डसौभाग्यविलासया तया समं पुनः राज्यसुखेषु अरज्यत ।
व्याख्या
स राजा शनै स्वस्थचित्तेन व्रतस्य पूर्वाचरितानुष्ठानस्य पारणाविधि समाप्ति-
कृत्य ब्राह्मणभोजनादिपूर्वकं स्वभोजनादिकं विधाय कृत्वा कृतार्थीकृत दान-
भोजनादिना सन्तुष्टमनोरथीकृत विप्रमण्डल ब्राह्मणसमुदायो येनैवम्भूतस्सन्नखण्ड
निरन्तर पत्सौभाग्य सधवत्व तस्य विलास सौख्य यस्यास्सा तया स्ववल्लभया
सह राज्यसुखेषु राजकीयसुखोपभोगेष्वरज्यत सरक्तो बभूव । मन्त्रिविनिविष्ट
राज्यकार्यभारमुररीकृत्य पूर्ववत्प्रजापालनतत्परोऽभूदिति भाव ।
भाषा
वह राजा, स्वस्थ चित्त से व्रत का पारण कर और ब्राह्मणो को दान भोजन
आदि से सन्तुष्ट करते हुए राज्य कार्य का भार लेकर अखण्ड सौभाग्यवती
होने के सौख्य से युक्त अपनी रानी के साथ राज्य सुख के उपभोग करने में
प्रवृत्त हुआ ।
क्रमेण तस्यां कमनीयमात्मजं शुभे मुहूर्ते पुरुहूतसन्निभः ।
अवाप्य सम्पादितमांसलोत्सवः परामगात्रिर्वृतिमोध्वरः क्षितेः ॥५७॥
अन्वयः
पुरुहूतसन्निभः क्षितेः ईश्वरः क्रमेण शुभे मुहूर्ते तस्यां कमनीयम्
आत्मजम् अवाप्य सम्पादितमांसलोत्सवः (सन्) परा निर्वृतिम् अगात् ।