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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

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विज्ञानभैरव : ३९
मयं सर्वं जगदिति विमर्शविषयं मनो न्यस्य मीलितलोचनः संकुचितभेददृष्टिः, अन्तः-
संकुचितहृदयादिबाह्यान्तरेन्द्रियवर्गः, क्रमेण मनसो दाढर्यात् सुषुम्णायामस्तङ्गतप्राणा-
पानादिचारेण तद्दाढर्याद् यल्लक्ष्यमस्ति तदेव लक्षयेत् । तेन घटोऽयमितिवत् प्रत्यक्षत
उत्तमं ज्योतिः पश्यतीत्यर्थः ॥३४॥
शिरःकपाल के भीतर विद्यमान छिद्र (सुषिर) में अपने मन को स्थापित कर, कपाल-
रन्ध्र में विद्यमान स्वयंप्रकाश प्रभास्वर ज्योति को आलम्बन बनाकर, उसमें धारणा, ध्यान और
समाधि का अभ्यास करना चाहिये । आँख मूँद कर इस प्रक्रिया को निरन्तर दोहराते रहने से
योगी के मन में क्रमशः दृढ़ता का संचार होता है और वह उस उत्तम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता
है, जिसका कि वर्णन “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” (३।३१) इस सूत्र में योगसूत्रकार भगवान्
पतंजलि ने किया है।
1कशब्देन परा शक्तिः पालकः शिवसंज्ञया ।
शिवशक्तिसमायोगः कपालः परिपठ्यते ॥
तन्त्रकोश के इस वचन के आधार पर 'क' शब्द परा शक्ति का और 'पाल' शब्द
शिव का वाचक है, अतः कपाल शब्द से यहाँ शिव और शक्ति के समायोग (सामरस्य) का
ग्रहण होना चाहिये । अनेक स्थानों पर उद्धृत "शवतयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महे-
श्वरः" इस श्रीकण्ठिसंहिता के वचन के अनुसार यह सारा जगत् शिव और शक्ति के,
तन्त्रशास्त्र में प्रकाश और विमर्श के नाम से प्रसिद्ध, स्वरूप में विद्यमान है । साधक को इसी
स्वरूप में अपने मन को स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिये और बाह्य विषयों से अपने
इन्द्रिय-चक्र को समेट लेना चाहिये । धीरे-धीरे उसकी भेद-दृष्टि, दूसरे से अपने को अलग
समझने का स्वभाव, घटती जाती है और उसकी बाह्य और आन्तर इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो
जाती हैं । क्रमशः उसका प्राण-चार, प्राण और अपान की गति, मध्यनाडी सुषुम्णा में लीन
हो जाता है और तब उसका मन दृढ़, अर्थात् अत्यन्त स्थिर हो जाता है । इस अवस्था
में वह उस स्वात्मस्वरूप उत्तम ज्योति का दर्शन उसी तरह से कर सकता है, जैसे कि कोई
मनुष्य घट, पट आदि पदार्थों को अपनी आँखों के सामने देखता रहता है ॥३४॥
[ धारणा-१२ ]
2मध्यनाडी मध्यसंस्था1 बिससूत्राभरूपया ।
ध्याताऽन्तर्व्योमया देव्या तया देवः प्रकाशते ॥३५॥
मध्यनाडी सुषुम्णाख्या, मध्यसंस्था हृदयमध्यस्था भवतीत्यन्वयः । बिससूत्र-
भरूपया सूक्ष्मत्वात् मृणालतन्तुतुल्याकारया ध्याताऽन्तर्व्योमया ध्यातं चिन्तितमन्तर्व्योम
चिदाकाशात्मकं यस्यां सा तथाविधया तया देव्या देवः प्रकाशः प्रकाशते । मध्यनाड्या-
१. °स्थ°-तवि० ।

  1. प्रस्तुत श्लोक को इसी श्लोक की व्याख्या में शिवोपाध्याय ने उद्धृत किया है ।
  2. तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १३१) पर यह श्लोक मिलता है ।