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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी

Source: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished256 pages

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३८ : विज्ञानभैरव
प्रत्यभिज्ञा के आधार पर ऐक्य भावना का अभिमान जाग उठता है । इस विषय को स्पन्द-
कारिका में इस तरह से समझाया गया है—
यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥
तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ।:
इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (२८-३० श्लो०)
अर्थात् यह जीवात्मा सर्वमय सर्वात्मक विश्वरूप है, क्योंकि यह सभी पदार्थों को
जानने वाला है और सभी पदार्थ इसी से उत्पन्न होते हैं। यह जीवात्मा सर्वमय इसलिये
भी है कि यह सभी संवेद्य (जानने योग्य) पदार्थों के साथ संवेदन (ज्ञान) के रूप में जुड़ा रहने
से सदा उनसे अभिन्न ही प्रतीत होता है । इस तादात्म्य अवस्था में शब्द और अर्थ की
अलग-अलग प्रतीति न होकर उनकी एकाकार प्रतीति होती है । इस स्थिति में ऐसी कोई
अवस्था नहीं बच रहती, जहाँ कि शिव का स्वभाव, चित् का प्रकाश, न प्रकाशित हो रहा
हो । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रकाश-स्वभाव चिदात्मक शिव ही ज्ञेय के रूप में
भासित होता है । अतः यह कहना ठीक ही है कि यह जीवात्मा सर्वमय है । जिस जीवात्मा को
इस स्थिति का ज्ञान हो जाता है, जिसमें इस प्रत्यभिज्ञा का उदय हो जाता है कि सब कुछ
मैं ही हूँ, वह इस सारे जगत् को अपनी लीला-भूमि समझने लगता है, वह सदा युक्त
अवस्था में, समाधि दशा में रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें तनिक भी संशय
नहीं है ।
स्पन्दकारिका के व्याख्याकार उत्पल वैष्णव, रामकण्ठ और क्षेमराज ने इन कारिकाओं
के अर्थ को विस्तार से समझाया है । जिज्ञासु जनों को उसे वहीं देखना चाहिये । अन्तिम निष्कर्ष
यही निकलता है कि जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है कि मैं सर्वमय हूं, तब अपने शरीर
में, दूसरे के शरीर में, अथवा भित्ति-प्राकार आदि में भी प्राणशक्ति का क्रमिक विकास कर वह
परम पद में प्रतिष्ठित हो सकता है ॥३३॥
[ धारणा-११ ]
कपालान्तर्मनो न्यस्य ति¹ष्ठन्मीलितलोचनः ।
क्रमेण मनसो दाढर्याल्लक्ष्येल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥३४॥
कपालान्तः शिरःकपालमध्ये यदन्तश्छिद्रमस्ति तदन्तरे, मनो न्यस्य कपाल-
रन्ध्रस्थिते स्वप्रकाशे प्रभास्वरे ज्योतिषि आलम्बने धारणाध्यानसमाधीन् संपाद्य, कूणित-
नेत्रः स्थितः सन् क्रमेण मनसो दाढर्याद् उत्तमं लक्ष्यं लक्षयेत्, “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्”
(यो० ३। ३१) इति न्यायात् । अथवा कपालान्तः प्रकाशविमर्शस्वरूपमध्ये शिवशक्ति-
१. ॰ल्ले॰-ख० ।