वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context७२ वेदान्तसार
में प्रतिपादित सिद्धान्त है। छान्दोग्योपनिषद् की टीका करते हुए आचार्य
आनन्दगिरि लिखते हैं-
प्रथममेकैकां देवतां द्विधा विभज्य, पुनरेकैकं भागं द्विधा द्विधा कृत्वा
तदितरभागयोर्निक्षिप्य त्रिवृत्करणं विवक्षितम् (6/3/2-3)
इसके अनुसार अग्नि, जल, पृथिवी इन तीन भूतों में से सर्वप्रथम
एक-एक को दो-दो भागों में विभाजित करके पुनः प्रत्येक एक-एक भाग
के दो-दो विभाग करके उन्हें परस्पर इसप्रकार संयुक्त किया जाए-
चित्र-१२
(चित्र विवरण:
ऊपर:
[वृत्त १: 1/2, 1/4, 1/4] अग्नि | [वृत्त २: 1/2, 1/4, 1/4] जल | [वृत्त ३: 1/2, 1/4, 1/4] पृथिवी
नीचे:
[वृत्त १: 1/2 अग्नि, 1/4 जल, 1/4 पृथिवी] | [वृत्त २: 1/2 जल, 1/4 अ., 1/4 पृथिवी] | [वृत्त ३: 1/2 पृथिवी, 1/4 अ., 1/4 जल])
त्रिवृत्करण
इसप्रकार करने पर अग्नि, जल और पृथिवी में प्रत्येक का आधा
अपना-अपना भाग होता है तथा शेष दो भूतों का चौथाई-चौथाई भाग होता
है। अतः प्रत्येक भूत में अपना प्राधान्य तथा अन्य दो भूतों का गौणभाव
होता है। इनके नामकरण का आधार भी यह गुणप्राधान्य ही है।
यद्यपि पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख श्रुति में भी हुआ है, तथापि प्रयोग
की सरलता की दृष्टि से उपनिषद्ग्रन्थों में त्रिवृत्करण का कथन किया गया
है, क्योंकि पञ्चीकरण की प्रक्रिया कुछ जटिल होने के कारण सामान्य-
व्यक्ति के लिए सरलतापूर्वक बोधगम्य नहीं है। वस्तुतः त्रिवृत्करण की
प्रक्रिया भी पञ्चीकरण की ओर ही संकेत करती है। अतः इसकी
प्रामाणिकता में संदेह नहीं करना चाहिए।
(१४) प्रमाण- प्रमा अर्थात् यथार्थज्ञान के कारण को दार्शनिक भाषा
में प्रमाण कहते हैं। यहाँ किसी भी कथन की सत्यता का आधार प्रमाण को
माना गया है। अन्य दर्शनों के समान वेदान्तदर्शन भी प्रमाणों को मान्यता
प्रदान करता है। उसकी दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म पूर्णतया सत्य, नित्य एवं