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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 85 of 314

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Page 85

भूमिका ७१
(4) स्थूल जल=1/2 जल +1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 अग्नि + 1/8 पृथ्‍वी
(5) स्थूल पृथिवी= 1/2 पृथिवी +1/8 आकाश+1/8 वायु+1/8 अग्नि+1/8 जल
इसप्रकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया से प्रत्येक सूक्ष्मभूत महाभूत होकर
पिण्ड के रूप में एक इकाई बन जाता है। अतः इस प्रक्रिया के पश्चात्
आकाश मात्र आकाश नहीं रहता, अपितु उसमें आकाशीयतत्त्व आधा रहता
है तथा शेष चार भूतों में से प्रत्येक का भी 1/8 भाग होने से इस स्थूलभूत
में उनके गुण भी विद्यमान रहते हैं। ठीक यही स्थिति शेष चार महाभूतों की
भी होती है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जिस भूत में जिस अंश
की प्रधानता रहती है, उसी के आधार पर उसका नामकरण होता है।
वेदान्तदर्शन के अनुसार इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से चौदहभुवन तथा उनमें
निवास करने वाले सम्पूर्ण प्राणिवर्ग अर्थात् चारप्रकार के स्थूलशरीरों का
निर्माण होता है। चित्र-११
आकाशादि पञ्चीकृत स्थूलमहाभूतों द्वारा निर्माण
चौदह भुवन | चतुर्विध स्थूलशरीर
| 14' 1 2 3 4
सप्त उर्ध्व लोक सप्त अधःलोक | ↓ | | |
1 2 3 4 5 6 7 जरायुज
| | | | | | | (मनुष्य पशु)
भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् अण्डज
1 2 3 4 5 6 7 ↓ (पक्षी सर्प)
| | | | | | | स्वेदज
अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल पाताल (जूं, मच्छर)
उद्भिज्ज
(वृक्ष-लता)
पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् ही आकाश में शब्दगुण की, वायु में
शब्द एवं स्पर्श की, अग्नि में शब्द, स्पर्श, रूप और रस की, तथा पृथिवी
में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक गुणों की अभिव्यक्ति होती है।
(१३) त्रिवृत्करण-वेदान्तसार के लेखक आचार्य सदानन्द ने
पञ्चीकरण प्रक्रिया के प्रसंग में ही त्रिवृत्करण का उल्लेख करते हुए इसे
पञ्चीकरण का ही उपलक्षण माना है—“अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं
त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युपलक्षणत्वात्” त्रिवृत्करण वस्तुतः उपनिषदों