वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका ६९
गई है। चञ्चलता, गति रजोगुण की विशेषता है। इसीलिए प्राणों में
गतिशीलता देखी जाती है तथा प्राणों के सान्निध्य से कर्मेन्द्रियाँ गतिशील
होती हैं। इसीकारण प्राणमयकोष को गतिशील अथवा क्रियाशीलकोष माना
गया है। विज्ञानमय तथा मनोमयकोष की क्रियाशीलता केवल अनुभव का
विषय होती है, अतः अप्रत्यक्ष होती है। जबकि इसकी क्रियाशीलता को
प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय ये तीनों कोष जीव
की स्वप्नावस्था में विद्यमान होते हैं।
(ङ) अन्नमयकोष-पञ्चम एवं अन्तिम अन्नमयकोष होता है। यह
जीव की जाग्रत अवस्था में विद्यमान रहता है। अतः इसीको जाग्रत भी
कहते हैं। अन्न के विकार का बाहुल्य होने से इसे अन्नमय कहा गया है
तथा आत्मा का आच्छादक होने से इसे कोष संज्ञा प्रदान की गई है। जीव
इसी कोष के माध्यम से विषयों का उपभोग करता है। भोगों के उपभोग में
सभीप्रकार की इन्द्रियाँ भी सहायक होती हैं। इस कोष का निर्माण पञ्चीकृत
महाभूतों से होता है।
उपर्युक्त पञ्चकोषों को एक साथ इसप्रकार भी समझा जा सकता है-
चित्र-८
मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान त्वक् चक्षु रसना पाणि पाद पायु
(ब्रह्म) (ब्रह्म) (बुद्धि) (मन)
(अ) ईश्वर (ब) ईश्वर श्रोत्र घ्राण वाक् उपस्थ
(१) आनन्दमय कोष (२) विज्ञानमय कोष (३) मनोमय कोष
बुद्धि + पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन + पञ्चकर्मेन्द्रिय
प्राण पाणि अग्नि
अपान + वाक् पाद वायु | जल
(उदान / पञ्चप्राण) प्राणमयकोष (पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा)
व्यान (४) पायु आकाश | पृथिवी
समान उपस्थ [(५) अन्नमय कोष]
(१२) पञ्चीकरणप्रक्रिया-स्थूलसृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया में
अद्वैतवेदान्त पञ्चीकरण के सिद्धान्त को महत्ता प्रदान करता है। इस सिद्धान्त
के अनुसार आकाश आदि पञ्चभूतों की तन्मात्राओं के संयोग से