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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 82 of 314

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६८ वेदान्तसार
(क) आनन्दमयकोष-आत्मा के आच्छादक होने के कारण अथवा
समूह में स्थित होने के कारण ही इन्हें कोष की संज्ञा प्रदान की गई है। इन
पञ्चकोषों में प्रथम आनन्दमयकोष की स्थिति सृष्टि के विकास की प्रथम
कारणावस्था में विद्यमान होती है। निर्गुणब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से
आच्छादित होता है तो वही कारणशरीर, ईश्वर तथा आनन्द की प्रचुरता के
कारण आनन्दमय कोष कहलाता है। प्रलय की अवस्था में भी यह विद्यमान
रहता है। यही सूक्ष्मशरीर का लयस्थान भी है। इसीलिए इस अवस्था को
सुषुप्ति कहा गया है। ये ही सब स्थितियाँ ब्रह्म के मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
से आच्छादित होने पर 'जीव' पक्ष में भी होती हैं। (द्रष्टव्य चित्र
संख्या-1)
(ख) विज्ञानमयकोष-जीव की स्वप्नावस्था में स्थित 'सूक्ष्मशरीर' में
तीन कोषों की स्थिति को स्वीकार किया गया है, विज्ञानमय, मनोमय तथा
प्राणमय। इन तीन कोषों के मिलने पर ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण होता है।
इनमें विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के
सात्त्विक अंशों से उत्पन्न श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, रसना और घ्राण इन पाँच
ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धितत्त्व विद्यमान रहता है। अन्तःकरण की निश्चयात्मक
वृत्ति 'बुद्धि' द्वारा ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ नियन्त्रित होती हैं। अतः इस कोष का
कार्य 'निश्चय' करना है।
(ग) मनोमयकोष-सूक्ष्मशरीर में स्थित तीन कोषों में से इसका द्वितीय
स्थान है। इसके अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुणप्रधान
अंशों से उत्पन्न वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के
साथ मन की स्थिति विद्यमान रहती है। मन के संकल्प-विकल्पात्मक होने
के कारण मनोमयकोष का कार्य संकल्पविकल्प माना गया है। दूसरे शब्दों
में यह कोष इच्छाशक्ति से युक्त होता है।
(घ) प्राणमयकोष-यह सूक्ष्मशरीर में ही स्थित तृतीयकोष है। शरीर
के विभिन्नस्थानों पर रहने वाले प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान नाम
पञ्चवायु एवं वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के
साथ मिलकर इस कोष का निर्माण होता है। क्रियाशीलता प्राण का धर्म है
अतः इनके प्रभाव से ही कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को सम्पादित करती
हैं। इस दृष्टि से इस कोष में क्रियाशीलता का प्राधान्य कहा जा सकता है।
वैसे भी पञ्चप्राणों की उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से मानी