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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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६६ वेदान्तसार
किया है, इनमें अनुसन्धानात्मिका अन्तःकरणवृत्ति को चित्त तथा
अभिमानात्मिकावृत्ति को अहंकार कहते हैं-
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं करणमान्तरम्।
संशयी निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे॥ (शारीरकोपनिषद्-12)
किन्तु आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में चित्त का बुद्धि में तथा अहङ्कार
का मन में ही अन्तर्भाव माना है- (अनयोरेव चित्ताहंकारयोरन्तर्भावः) उनके
अनुसार गर्वरूप अहङ्कार जिसमें संशयात्मकरूप में स्थित, अपने उत्कर्ष की
सम्भावना का मन में अन्तर्भाव करना चाहिए। इसीप्रकार विषय का
परिच्छित्ति (स्मरण) रूप में ज्ञान कराने वाले चित्त का अन्तर्भाव बुद्धि में
करना संगत प्रतीत होता है, क्योंकि स्मरण की उत्पत्ति निश्चयात्मक अनुभव
से ही होती है।
इसप्रकार कारणशरीर के निर्माण में विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन
कोषत्रय की महती भूमिका रहती है, क्योंकि विज्ञानमयकोष में
पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+बुद्धि होता है। मनोमयकोष का निर्माण पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+मन
द्वारा होता है। इसीप्रकार पञ्चप्राण सहित कर्मेन्द्रियों का समूह प्राणमयकोष
कहलाता है। अतः कोष की दृष्टि से कारणशरीर के स्वरूप का उल्लेख
इसप्रकार भी किया जा सकता है-
चित्र-६
कारण । शरीर
┌─────────────┼─────────────┐
विज्ञानमयकोश मनोमय कोश प्राणमय कोश
(बुद्धि+पञ्चज्ञाने०) (मन+पञ्चज्ञाने०) (पञ्चकर्मे०+पञ्चप्राण)
↓ ↓ ↓
(व्यावहारिक कार्यों का कर्ता) (इच्छाशक्ति सम्पन्न) (क्रियाशीलता का प्राधा.)
कर्तृरूप करणरूप कार्यरूप
(स) स्थूलशरीर-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के पञ्चीकरण के बाद
आकाश आदि स्थूलभूतों की उत्पत्ति होती है, जिसका विस्तृतवर्णन आगे
सृष्टिप्रक्रिया के अन्तर्गत किया जाएगा। इन स्थूलभूतों द्वारा ब्रह्माण्ड का
निर्माण होता है एवं उसमें चार प्रकार के स्थूल शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते
हैं। यहाँ हम इन्हीं चारों स्थूल शरीरों का उल्लेख करेंगे-