वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका ६५
से इसका उत्क्रमण माना गया है। पञ्चवायुओं की स्थिति एवं कार्य को
इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-५
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से
पञ्चवायु
प्राण अपान व्यान समान उदान
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नासिकाग्रवर्ती गुदा-उपस्थवर्ती सम्पूर्णशरीरस्थ उदरस्थ कण्ठस्थ
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श्वास मलमूत्रनिस्सारण रक्तसंचरण पाचन मृत्यु के समय निस्सरण
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ऊर्ध्वगमनशीला अधोगमनशीला सर्वत्रगमनशीला अधोगमनशीला ऊर्ध्वगमनशीला
उपर्युक्त पञ्चवायुओं के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाग, कूर्म, कृकल,
देवदत्त तथा धनञ्जय पाँच अन्य वायुओं के अस्तित्व को भी स्वीकार किया
है। उनके अनुसार नागवायु उद्गार एवं वमन लाने वाली, कूर्मवायु आँखों
का उन्मीलन, निमीलन कराने वाली, कृकल नामक वायु भूख लगाने वाली,
देवदत्त नामक वायु जमुहाई लाने वाली होती है। इसीप्रकार धनञ्जय नामक
वायु द्वारा शरीर का पोषण किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्र इन सभी का
अन्तर्भाव पूर्ववर्णित चारों वायुओं में कर लेता है। (एतेषां प्राणादिष्वन्तर्भावात्
प्राणादयः पञ्चैवेति केचित् (वेदान्तसार)। विद्वन्मनो- रञ्जनीकार
स्वामीरामतीर्थ ने विस्तारपूर्वक नाग आदि पञ्चवायुओं का अन्तर्भाव
पूर्ववर्णित प्राण, अपान इत्यादि वायुओं में ही किया है।
(घ) बुद्धि और मन-ये दोनों शरीर के अन्तःभाग में स्थित इन्द्रियाँ
हैं। अतः इन्हें अन्तरिन्द्रिय भी कहा जाता है। वस्तुतः ये दोनों ज्ञानेन्द्रियों के
माध्यम से विषयों का ग्रहण करती है। इसलिए इन्हें अन्तःकरण भी कहते
हैं। अन्तःकरण की निश्चयात्मकवृत्ति को 'बुद्धि' कहा गया है। इसका कार्य
अध्यवसाय अर्थात् निश्चय करना है। इसके अतिरिक्त मन अन्तःकरण की
ही दूसरी वृत्ति है। इसका कार्य संकल्प-विकल्प करना है। इनकी उत्पत्ति
आकाशादिक सात्त्विक अंश के मिश्रितरूप से मानी गयी है। कुछ विद्वानों ने
अन्तःकरण की चित्त और अहंकार नामक दो अन्य वृत्तियों का भी उल्लेख