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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 75 of 314

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Page 75

भूमिका ६१
चित्र-१
[ब्रह्म] शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान से आवृत्त | मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान
│ ┌─ आनन्दमय कोष <──────────────┐ (ब्रह्म)
↓ │ ├─ कारण शरीर <──────────────┤ जीव
ईश्वर ─┼─ सुषुप्ति अवस्था <─────────────┤
(1) └─ लय स्थान <───────────────┘ (2)
(ब) सूक्ष्मशरीर—इसका केवल अनुमानप्रमाण द्वारा ही ज्ञान होता है।
हम इसे किसी भी प्रकार देख अथवा छू नहीं सकते हैं। इसीकारण इसे
सूक्ष्मशरीर कहा जाता है। इसका दूसरा नाम 'लिङ्गशरीर' भी है। स्वामी
रामतीर्थ ने इसकी व्युत्पत्ति इसप्रकार की है—
“लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च
शरीराणि चेति लिङ्गशरीराणि" (वेदान्तसार-विद्वन्मनोरञ्जनी-पृ. 100)
इसी के माध्यम से जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है। वेदान्तदर्शन
के अनुसार इसमें सत्रह अवयव होते हैं—पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ,
पञ्चवायु तथा बुद्धि एवं मन। पञ्चदशीकार के अनुसार—
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया।
शरीरं सप्तदशाभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (1/23)
जीव के पापपुण्यों (धर्म-अधर्म) का लेखा-जोखा इसीकारणशरीर में
विद्यमान रहता है। यही जीवात्मा का एक प्रकार से घर अथवा निवास
स्थान है। कठोपनिषद्कार ने इसे 'रथ' की संज्ञा भी दी है। इसका रथी
आत्मा है, क्योंकि एक स्थूलशरीर से दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करने के
लिए यह सूक्ष्मशरीर आश्रय अथवा माध्यम का कार्य करता है।
इसी प्रसङ्ग में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सांख्यदर्शन भी सूक्ष्मशरीर
के अस्तित्व को स्वीकार करता है। उसने इसके अट्ठारह तत्त्वों को मान्यता
प्रदान की है—महत् (बुद्धि), अहङ्कार, मन, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय,
पञ्चप्राण। अतः स्पष्ट है कि सांख्यदर्शन 'अहङ्कार' को सूक्ष्मशरीर में
अधिक तत्त्व के रूप में स्वीकार करता है। जबकि वेदान्तसार के टीकाकार