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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 74

६० वेदान्तसार
सम्पन्न जीवनमुक्त को यह जगत् परमार्थतः असत् एवं मिथ्या प्रतीत होता
है।
इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि तत्त्वज्ञान की स्थिति में जगत्
अर्थात् बाह्यपदार्थों का अभाव नहीं होता है। उसकी सत्ता पूर्ववत् बनी रहती
है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक जीव के मुक्त होने पर सभी के लिए
जगत् का अभाव हो जाता। इसलिए तत्त्वज्ञान की स्थिति में इसे इसप्रकार
समझना चाहिए कि दृश्यमानजगत् अपने उसी रूप में विद्यमान रहता है!
केवल साधक का दृष्टिकोण बदल जाता है। उसकी भावना या ज्ञान में
अन्तर आ जाता है और वह ब्रह्मैक्य को प्राप्त करके जगत् को मिथ्या
मानने लगता है।
(१०) शरीरत्रय-वेदान्तदर्शन के अनुसार जीव के तीन शरीर होते हैं-
(अ) कारणशरीर (ब) सूक्ष्मशरीर तथा (स) स्थूलशरीर।
“स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमुपाधित्रितयं चित्रेः।
एभिर्विशिष्टो जीवः स्याद् विमुक्तः परमेश्वरः॥
(अ) कारणशरीर-सृष्टि के प्रारम्भ में जीव कारणशरीर का आश्रय
लेकर विद्यमान रहता है। जैसाकि पूर्व में प्रतिपादित किया जा चुका है कि
अद्वैतवेदान्त केवल ब्रह्म की शाश्वतस्थिति को ही स्वीकार करता है तथा
द्वैतवेदान्त, ब्रह्म और माया इन दोनों के हमेशा (नित्य) अस्तित्व को मान्यता
प्रदान करता है। माया सत्त्व, रजस् तथा तमस् इन तीनों गुणों का नाम है।
इसीको अज्ञान भी कहा जाता है।
ब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त होता है तो इसीको ईश्वर
कहा जाता है। यही अव्यक्त, अन्तर्यामी संसार का कारणरूप होने से
कारणशरीर कहलाता है। इसमें आनन्द का प्राचुर्य रहता है। अतः इसीको
'आनन्दमयकोष' भी कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भी इसकी स्थिति बनी
रहती है। सूक्ष्म एवं स्थूलशरीरों का यह लयस्थान भी होता है। साथ ही
स्थूल एवं सूक्ष्म जगत्प्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण इसीको 'सुषुप्ति'
भी कहा गया है।