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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 272 of 314

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Page 272

२५८ वेदान्तसार


इसप्रकार निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि गुरु के उपदेश के
परिणामस्वरूप अधिकारी प्रमाता में जब 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि अज्ञातब्रह्म
विषयकचित्तवृत्ति का उदय होता है तो वह प्रथमतः जीव के चैतन्यगत
अज्ञान के आवरण को दूर करती है। उस अज्ञान के दूर होने के साथ ही
उस चित्तवृत्ति का अस्तित्व भी दूषितजल को स्वच्छ करने वाले कतकचूर्ण
के समान तथा अरणि में उत्पन्न अग्नि के समान स्वतः ही समाप्त हो जाता
है। उस स्थित में चैतन्य का प्रतिबिम्बरूप चैतन्याभासमात्र रह जाता है, जो
स्वयं परमशुद्धचैतन्य का ही अंश है। इसलिए परमशुद्धचैतन्यरूप, सूर्य को
प्रकाशित करने में अक्षम दीपक के समान, वह भी उसी में विलीन हो
जाता है और तब परमशुद्धचैतन्यमात्र शेष बचता है। यही 'अहं ब्रह्मास्मि'
की सात्त्विक एवं अन्तिम अनुभूति है।
इसी प्रसंग में जड़पदार्थ घट-पटादि के प्रत्यक्ष में उत्पन्न वृत्ति की
भिन्नता का प्रतिपादन करते हैं-सांसारिक घट-पट आदि जड़पदार्थों के
आकार से आकारितवृत्ति, वस्तुतः ब्रह्मज्ञान विषयकवृत्ति से भिन्न होती है।
उस समय प्रमाता में 'अयं घटः' तथा 'अहं घटविषयक ज्ञानवान्' इसप्रकार
की अज्ञात घटविषयकवृत्ति का उदय होता है, जो घटावच्छिन्नचैतन्य को
आवृत करने वाले घटविषयक अज्ञान का विनाश करके, अपने में वर्तमान
चिदाभास द्वारा घट को प्रकाशित करती है। इस प्रक्रिया को समझाने के
लिए ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को उद्धृत करते हैं। जिसका अभिप्राय
है कि-
बुद्धि एवं बुद्धि में प्रतिबिम्बित चिदाभास ये दोनों सबसे पहले घट में
जाकर व्याप्त होते हैं। परिणामस्वरूप बुद्धि अर्थात् वृत्ति द्वारा घटविषयक
अज्ञान विनष्ट कर दिया जाता है तथा वृत्ति में प्रतिबिम्बित होने वाले
चिदाभास द्वारा घट प्रकाशित होता है।
पुनः ग्रन्थकार इसी बात को एक उदाहरण देकर समझाते हैं-जिसप्रकार
दीपक पहले अंधकार में रखे हुए घट-पटादि के आवरणरूप अंधकार को
दूर करता है तथा बाद में अपने उसी प्रकाश से उन्हें प्रकाशित करता है।
ठीक उसीप्रकार घटादि के आकार से आकारित चित्तवृत्ति घटादिविषयक
चैतन्य के अज्ञानरूपी आवरण को पहले विनष्ट करती है और बाद में
स्वप्रतिबिम्बित चिदाभास द्वारा घटादिकों को भी प्रकाशित करती है। अतः