वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 271 of 314
Read in contextअनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५७
'वह परमब्रह्म मन से ही देखने योग्य है' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में जब उसे
मन द्वारा प्राप्य कहा जाता है, तब उस स्थिति में प्रयुक्त 'मन' से अभिप्राय
'वृत्तिव्याप्ति' से ग्रहण करना चाहिए तथा जब 'उसे मन द्वारा जाना नहीं
जा सकता' ऐसा श्रुतिवचन उपलब्ध होता है, तब ब्रह्मतत्त्व को मन एवं
बुद्धि से परे बताया गया है। उस स्थिति में हमें 'फलव्याप्ति' रूप अर्थ लेना
चाहिए।
इसप्रकार अर्थग्रहण करने पर इन दोनों श्रुतिवचनों 'मनसैवानुद्रष्टव्यं' एवं
'यन्मनसा न मनुते' का स्थूलदृष्टि से प्रतीत होने वाला विरोध स्वतः ही नष्ट
हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि अनुभूति
में-चैतन्य प्रतिबिम्बसहित अखण्डाकार से आकारित वृत्ति द्वारा प्रत्यक्
(आन्तरिक) चैतन्यगत अज्ञान नष्ट होकर प्रत्यग्-अभिन्न परब्रह्ममात्र शेष रह
जाता है, क्योंकि स्वयंप्रकाशमान होने के कारण यदि वह वृत्तिगत चिदाभास
द्वारा प्रकाशित ही किया जा सकता तो 'मनसैवानुद्रष्टव्यं' एवं 'यन्मनसा न
मनुते' इत्यादि श्रुतिवचनों में विरोध नहीं होता, क्योंकि अन्तःकरणरूप वृत्ति
में प्रतिबिम्बित चिदाभास द्वारा अज्ञान से उपहित चैतन्य के अज्ञानरूप
आवरण की समाप्तिपूर्वक स्वरूपज्ञान के अभिप्राय से कही गई
श्रुति-'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' चरितार्थ हो जाती है।
साथ ही स्वयंप्रकाशमान परब्रह्म किसी अन्य द्वारा प्रकाशित नहीं हो
सकता, यह मन, वाणी एवं बुद्धि इन सबसे परे है। इसलिए इस अभिप्राय
को ध्यान में रखकर कहे गए 'यन्मनसा न मनुते' इत्यादि श्रुतिवचन भी
चरितार्थ हो जाते हैं। इसीलिए वेदान्तशास्त्र के विद्वानों ने ब्रह्मस्थित अज्ञान
के विनाश के लिए वृत्तिव्याप्यत्व की अपेक्षा तो प्रदर्शित की है, किन्तु फल
की व्याप्ति का निषेध किया है, क्योंकि स्वयं प्रकाशित होने के कारण उसे
चैतन्याभास जैसे प्रकाशकतत्त्व की आवश्यकता नहीं रहती है। चैतन्याभास
वस्तुतः शुद्धचैतन्य का ही एक अंश है। इसलिए उसे प्रकाशित न कर पाने
के कारण वह परमशुद्धचैतन्य में ही, उसीप्रकार विलीन हो जाता है,
जिसप्रकार दूषित जल को साफ करने के लिए प्रयोग किया गया कतकरेणु
नामक पदार्थ स्वयं भी उसी जल में विलीन हो जाता है। अथवा अरणिगत
अग्नि अरणि से उत्पन्न होने के बाद, अरणि के जल जाने पर स्वयं भी
स्वतः ही शान्त हो जाती है।