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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 264 of 314

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Page 264

२५० वेदान्तसार
भिन्नपरब्रह्मावभासनानर्हतया तेनाभिभूतं सत्स्वोपाधिभूताखण्डचित्तवृत्ते-
र्बाधितत्वाददर्पणाभावे मुखप्रतिबिम्बस्य मुखमात्रत्ववत्प्रत्यगभिन्नपरब्रह्ममात्रं
भवति॥२८॥
पदच्छेद-अथ अधुना 'अहम् ब्रह्म अस्मि' इति अनुभववाक्यार्थः वर्ण्यते।
एवम् आचार्येण अध्यारोप-अपवाद-पुरःसरम् तत्-त्वम्-पदार्थों शोधयित्वा
वाक्येन अखण्डार्थे अवबोधिते 'अधिकारिणः अहम्' नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-
सत्य-स्वभाव-परमानन्द-अनन्त-अद्वयम् 'ब्रह्म अस्मि' इति अखण्डाकार-
आकारिता-चित्तवृत्तिः उदेति।
सा तु चित् प्रतिबिम्बसहिता सती प्रत्यक् अभिन्नम् अज्ञातम् परमब्रह्म
विषयीकृत्य तद्गत-अज्ञानम् एव बाधते। तदा पटकारण-तन्तुदाहे पट-दाहवद्,
अखिल-कारणे अज्ञाने बाधिते सति, तत् कार्यस्य अखिलस्य बाधितत्वात् तद्
अन्तर्भूत-अखण्डकार-आकारिता चित्तवृत्तिः अपि बाधिता भवति ।
तत्र प्रतिबिम्बितम् चैतन्यम् अपि यथा दीपप्रभा-आदित्यप्रभा-
अवभासन-असमर्था सती, तया अभिभूता भवति तथा स्वयंप्रकाशमान- प्रत्यग्
अभिन्न-परमब्रह्म-अवभासन-अनर्हतया तेन अभिभूतम् सत्
स्व-उपाधिभूत-अखण्डचित्तवृत्तेः बाधितत्वाद्, दर्पण-अभावे मुख-
प्रतिबिम्बस्य मुख-मात्रत्ववत्, प्रत्यग् अभिन्नपरब्रह्ममात्रम् भवति॥२८॥
अनुवाद-इसके पश्चात् अब 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि अनुभववाक्यार्थ का
वर्णन किया जा रहा है। इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवाद सहित आचार्य द्वारा
तत् एवं त्वम् इन दोनों पदार्थों में शोध करके (तत्त्वमसि) वाक्य द्वारा
अखण्ड अर्थ का ज्ञान कराये जाने पर, 'मैं अधिकारी हूँ' मैं नित्य, शुद्ध,
बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव, परमानन्दस्वरूप, अनन्त एवं अद्वैत ब्रह्म हूँ, इत्यादि
अखण्डाकार से आकारित चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है।
'चित्' के प्रतिबिम्ब से युक्त होती हुई (चित्तवृत्ति) तो आन्तरिक, सबसे
भिन्न एवं अज्ञात परमब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें स्थित अज्ञान का ही
बाध करती है। तब वस्त्र के कारणरूप तन्तुओं के जल जाने पर वस्त्रदाह
के समान, सम्पूर्ण (संसार) के कारणभूत अज्ञान के विनष्ट हो जाने पर,
उसके कार्यरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपञ्च के बाध होने से, उसके अन्दर स्थित
अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति भी समाप्त हो जाती है।