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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 263 of 314

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Page 263

अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २४९
एवं त्वम् पद अविरुद्ध परमशुद्धचैतन्यमात्र को लक्षित करते हैं। यही भाग
लक्षणा भी है। यही वेदान्त का सिद्धान्त भी है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने सोदाहरण अपना पक्ष
प्रस्तुत किया है।
(2) 'सोऽयं देवदत्तः' एवं 'तत्त्वमसि' वाक्यों में लक्षणा की दृष्टि से
परस्पर संगति प्रतिपादित की है।
(3) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-५४
भागलक्षणा (जहदजहल्लक्षणा)
सः ────────► विशिष्ट ◄──────── अयम्
(तत्काल) ↓ (एतत्काल)
देवदत्तः
(पिण्ड विशेष)
┌──────┐ ▲ ┌──────┐
तत् │ अभिन्नता │ │ │ अभिन्नता │ त्वम्
(परोक्षत्व) ◄─│ की प्रतीति│ │ ─►│ की प्रतीति│ (अपरोक्षत्व)
↓ └──────┘ │ └──────┘ ↓
विशिष्ट ────────► चैतन्य ◄──────── विशिष्ट
(तुरीय)
▲
(विरुद्धांश के परित्यागपूर्वक)
अवतरणिका-इसप्रकार 'तत्त्वमसि उपदेशवाक्य में प्रयुक्त होने वाले
सम्बन्ध एवं उसकी अर्थप्रतीति को स्पष्ट करने के पश्चात् ग्रन्थकार 'अहं
ब्रह्मास्मि' इत्यादि अनुभवमहावाक्य को स्पष्ट करते हैं-
अथाधुनाहं ब्रह्मास्मीत्यनुभववाक्यार्थो वर्ण्यते। एवमाचार्येणाध्यारो-
पापवादपुरःसरं तत्त्वम्पदार्थों शोधयित्वा वाक्येनाखण्डार्थेऽवबोधितेऽधि-
कारिणोऽहं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यस्वभावपरमानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्मास्मीत्य-
खण्डाकाराकारिताचित्तवृत्तिरुदेति। सा तु चित्प्रतिबिम्बसहिता सती
प्रत्यगभिन्नमज्ञातं परं ब्रह्म विषयीकृत्य तद्गताज्ञानमेव बाधते तदा
पटकारणतन्तुदाहे पटदाहवदखिलकारणेऽज्ञाने बाधिते सति
तत्कार्यस्याखिलस्य बाधितत्वात्तदन्तर्भूताखण्डाकाराकारिता चित्तवृत्तिरपि
बाधिता भवति। तत्र प्रतिबिम्बितं चैतन्यमपि यथा दीपप्रभादित्यप्रभाव-
भासनाससमर्था सती तयाभिभूता भवति तथा स्वयम्प्रकाशमानप्रत्यग-