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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 249 of 314

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Page 249

महावाक्यार्थ-निरूपण २३५
‘चन्द्रिका’—प्रस्तुत अंश की विस्तृत व्याख्या के लिए द्रष्टव्य, भूमिका
में वर्णित महावाक्य (अ) ‘तत्त्वमसि’ (पृष्ठ संख्या-103)
विशेष—(1) यद्यपि महावाक्यविवरण नामक ग्रन्थ में 11 महावाक्य
उद्धृत किए गए हैं तथापि वेदान्त में चार महावाक्यों की विशेषचर्चा की
गई है। जो इसप्रकार है—
(क) प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेयोपनिषद्-5) (ख) तत्त्वमसि (छान्दोग्योपनिषद्
6.8.7) (ग) अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यकोपनिषद्-1.4.10) (घ) अयमात्मा
ब्रह्म (माण्डूक्य० 2)
(2) महावाक्यों का वर्ण्यविषय ब्रह्म के स्वरूप एवं अद्वैत का प्रतिपादन
करना है।
(3) ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य वस्तुतः उपदेशवाक्य है। जो एक गुरु द्वारा
अधिकारी प्रमाता को उपदेश रूप में दिया जाता है।
(4) यहाँ लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध को ‘भागलक्षणा’ भी कहा गया है
ग्रन्थकार ने इसकी व्याख्या आगे विस्तार से की है।
(5) लक्षणा तीन प्रकार की होती है (क) जहत् लक्षणा (ख) अजहत्
लक्षणा (ग) जहत् अजहत् लक्षणा (इसीको भागलक्षणा भी कहा गया है)
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं—
चित्र-५०
तत्त्वमसि ───> सोऽयं देवदत्तः वत्
सम्बन्ध त्रयम्
पदों में पदों के अर्थों में (आन्तरिक गुणों के कारण)
समानाधिकरण्य विशेषण विशेष्यभाव लक्ष्यलक्षणभाव (भागलक्षणा)
तत्काल विशिष्ट एतत् कालविशिष्ट (सः अयम् त्वम् तत्)
देवदत्त
परोक्षादि गुणयुक्त अपरोक्षादि गुणयुक्त देवदत्त सः अयम् त्वम् तत्
चैतन्य रूप समान आधार होने से चैतन्य समान अंश के तात्पर्य का बोधक
चैतन्य में भेद का अभाव होने से