Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 248 of 314

Read in context
Page 248

२३४ वेदान्तसार
का बोध कराने वाला होता है। वे तीन सम्बन्ध वस्तुतः-दो पदों का
समानाधिकरण्यसम्बन्ध, दो पदों के अर्थों का विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध एवं
आन्तरिक आत्मा तथा उसको बताने वाले लक्षण दोनों में लक्ष्यलक्षणभाव-
सम्बन्ध है। इसीलिए कहा गया है- अन्तरात्मा के पदों एवं अर्थों
में-समानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव एवं लक्ष्यलक्षणभाव ये तीन सम्बन्ध
होते हैं।
(1) समानाधिकरण्यसम्बन्ध-जैसा कि 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि
वाक्य में तत्कालविशिष्ट देवदत्त का बोध कराने वाला 'सः' (वह) इस
शब्द का तथा एतत् कालविशिष्ट देवदत्त का कथन करने वाले 'अयम्'
(यह) इस शब्द का, एक ही शरीर में तात्पर्यबोध करानारूप सम्बन्ध है।
इसके अतिरिक्त 'तत्त्वमसि' (वह तुम हो) इत्यादि वाक्य में भी परोक्षत्व
आदि गुणों से युक्त चैतन्य का कथन करने वाले 'तत्' (वह) इस पद का
तथा अपरोक्षत्व आदि गुणों से विशिष्ट चैतन्य का प्रतिपादन करने वाले
'त्वम्' (तुम) इस पद का एक ही (तुरीय) चैतन्य में तात्पर्य का बोध
कराने वाला सम्बन्ध है।
(2) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध- तो, जैसाकि उसी वाक्य में 'सः'
(वह) शब्द का अर्थ तत्कालविशिष्ट देवदत्त के, 'अयम्' (यह) शब्दार्थ
एतत्कालविशिष्ट देवदत्त के परस्परभेद को दूर करने के कारण
विशेषण-विशेष्यभावसम्बन्ध है। उसीप्रकार इस 'तत्त्वमसि' वाक्य में भी
'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य के 'त्वम्' शब्द का अर्थ
अपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य के परस्परभेद को दूर करने के कारण
विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध है।
(3) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध-तो, जैसाकि उसी वाक्य में 'सः' (वह)
और अयम् (यह) इन दोनों शब्दों एवं उनके अर्थों में से परस्पर विरुद्ध
(प्रतीत होने वाले) अतीत और वर्तमान की विशिष्टता का परित्याग करके,
समानरूप से स्थित देवदत्तरूप अंश में (तात्पर्य का बोध कराना ही)
लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त इस वाक्य में भी 'तत्' और
'त्वम्' इन दोनों पदों का अथवा उन दोनों अर्थों के परस्पर विरुद्ध
परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि के वैशिष्ट्य का परित्याग करके अविरुद्धचैतन्य के
साथ लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध है। यही भागलक्षणा कही जाती है।