वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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'चन्द्रिका'—इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवादरूप दोनों सिद्धान्तों को
भलीप्रकार समझने के बाद यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि सम्पूर्ण
चराचर नामरूपात्मक जगत् ही वस्तुतः ब्रह्म है तथा ब्रह्म ही सम्पूर्ण चराचर
नामरूपात्मक संसार है। साथ ही 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्'
एवं 'त्वम्' पदों के अर्थों का अभिप्राय भी पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाता है।
तदनुसार-अज्ञान, कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टि तथा
इनकी उपाधि से युक्त चैतन्य, सर्वज्ञता, व्यापकता आदि गुणों से विशिष्ट
ईश्वर, हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) और विराट् (वैश्वानर) रूप चैतन्य एवं इन सब
उपाधियों से रहित तुरीय ब्रह्मरूप शुद्धचैतन्य, इन सब में ठीक उसीप्रकार
अभिन्नता विद्यमान है, जिसप्रकार तप्त लोहपिण्ड कहने पर लोहपिण्ड एवं
अग्नि में अभिन्नता की प्रतीति होती है। यही इस तत् पद का वाच्यार्थ
अर्थात् अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्राप्त सीधा अर्थ है।
इसके अतिरिक्त अज्ञान से उपहित ईश्वररूप चैतन्य का आधार जो
उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है, उसका अज्ञान एवं उससे आच्छादित ईश्वर रूप
चैतन्य से अलग-अलगरूप में प्रकाशित होना ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य में
प्रयुक्त 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ है।
इस भाव को 'तप्तायः पिण्डः' इस उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा
सकता है। तपे हुए लोहपिण्ड से जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' ऐसा
सामान्यरूप से कहा जाता है, जबकि दाहकताशक्ति लोहे में न होकर अग्नि
में विद्यमान रहती है। इसलिए अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित इस
साक्षात् संकेतित अर्थ, वाच्यार्थ में अग्नि एवं लोह में अभिन्नतारूप अर्थ ही
प्रमुखता लिए होता है। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य में भी 'तत्'
अर्थात् शुद्धचैतन्य (तुरीय) एवं त्वम् अर्थात् उपाधियुक्त चैतन्य (जीव) की
अभिन्नता का कथन ही मुख्यप्रयोजन होने से इसका वाच्यार्थ अर्थात् सीधा
अर्थ कहलाएगा।
इसके अतिरिक्त 'तप्तायः पिण्ड' इत्यादि उदाहरण में दाहकताशक्ति लोहे
में विद्यमान न होने के कारण 'लोहे से जल गया' ऐसा कहने पर मुख्य
अर्थ का बाध होने पर लक्षणा शब्दशक्ति से 'अग्नि' रूप अर्थ के साथ
'लोहे में स्थित अग्नि से जल गया' इसप्रकार लक्ष्यार्थ की प्रतीति में अग्नि
एवं लोहे की भिन्नता की प्रतीति कराना ही मुख्यप्रयोजन होगा। ठीक
इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से प्रतीत होने वाले शुद्धचैतन्य