वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 238 of 314
Read in context२२४ वेदान्तसार
दार्शनिकभाषा में 'अरुन्धती न्याय'¹ भी कहते हैं। जहाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म विषय
को समझाने के लिए पहले स्थूल को बताते हुए क्रमशः सूक्ष्म की ओर
बढ़ते हैं।
अतः इन श्रुतिवचनों में भी पूर्व-पूर्व में प्रस्तुत श्रुति की अग्रिम श्रुति के
प्रति आत्मारूप सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तु का ज्ञान कराने के लिए, आरूढ़ होते हुए
सोपान के समान सहयोग की भावना ही परिलक्षित होती है।
विशेष-(1) उपर्युक्त वर्णन के आधार पर ग्रन्थकार ने सिद्ध करने का
सफल प्रयास किया है कि शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि आदि से
विलक्षण एवं उन सबका अध्यक्ष अन्तरात्मा इन सबसे सर्वथा भिन्न है।
(2) पुत्रादिकों के आत्मत्व के सिद्धान्त का खण्डन अत्यन्त सरल एवं
संक्षिप्तरूप में किया गया है।
(3) ग्रन्थकार ने आत्माविषयक अपने मत का प्रतिपादन श्रुति, तर्क
(युक्ति) एवं अनुभववाक्यों द्वारा पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्तों की शैली के
आधार पर ही किया है।
(4) प्रत्यक् आत्मा (वस्तु) शुद्धचैतन्य
चित्र-४७
┌ श्रुति-प्रत्यगस्थूलोऽचक्षुरप्राणोऽमना
│ अकर्ता चैतन्य चिन्मात्रं सत्
├ तर्क-पुत्रादि से लेकर शून्यपर्यन्त सम्पूर्ण
│ जड़, घटादि के समान अनित्य
└ अनुभव-अहं ब्रह्म अस्मि-मैं ब्रह्म हूँ।
अवतरणिका-इसप्रकार अध्यारोपविषयक सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन
एवं अद्वैत का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार इसी के द्वितीयपक्ष
'अपवाद' को स्पष्ट करते हैं-
अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्ववद्वस्त
ुविवर्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्। तदुक्तम्-
“सतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विकार इत्युदीरितः।
- अरुन्धती न्याय का विस्तृत वर्णन भूमिका में शीर्षक संख्या 24 पृष्ठ संख्या 101 पर
द्रष्टव्य है।