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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 237 of 314

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Page 237

चार्वाकादिमत-निराकरण २२३

साथ ही घट, पट आदि वस्तुओं के समान अनित्य हैं, नाशवान् हैं, अतः वे
आत्मा हो ही नहीं सकते हैं।
साथ ही वेदान्त के जीवन्मुक्त विद्वानों ने अपनी साधना द्वारा स्वयं को
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में अनुभव भी किया है। उनके अनुभव की
प्रबलता को देखते हुए, यही सिद्ध होता है कि इससे पूर्व विभिन्नमत
मतान्तर जो पुत्र आदि को आत्मा बताते रहे हैं, वे ठीक नहीं हैं, क्योंकि
उन्हीं द्वारा दी गई युक्तियों के आधार पर ही उत्तरोत्तर सिद्धान्त का खण्डन
स्वतः ही हो जाता है। अतः पुत्र आदि को आत्मा मानना उचित एवं
न्यायसंगत नहीं है।
पुनः प्रश्न उठता है कि यदि पुत्रादि आत्मा नहीं है तो फिर आपके मत
में आत्मा क्या है? इसी का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि
'वस्तुतः सदैव विद्यमान रहने वाला पुत्रादि के समान कभी भी विनष्ट न
होने वाला, जन्म-मरण आदि दुःखों से रहित, सभीप्रकार के बन्धनों से
रहित, अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी भी अन्यप्रकार के प्रकाश की
अपेक्षां न रखने वाला, स्वयं प्रकाशक, मुक्तस्वभाव, सभी के अन्तःकरण में
विद्यमान रहने वाला, शुद्धचैतन्य ही आत्मा है। यही यथार्थ तत्त्व है, सत्य
है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों के ज्ञाता
विद्वानों का अनुभव भी यही है।' इसप्रकार ब्रह्मरूप वस्तु का प्रतिपादन
करके ग्रन्थकार कहते हैं कि यही अध्यारोप है कि हम शुद्धचैतन्य को सत्य
न मानकर पुत्र आदि को सत्य मान बैठे हैं। अपने अज्ञानवश हमने अवस्तु
में वस्तु का आरोप किया हुआ है।
किन्तु इस सम्पूर्णप्रसङ्ग में यह शङ्का अत्यन्त स्वाभाविकरूप से होती है
कि कुछ श्रुतियों में पुत्र आदि को आत्मा कहा गया है तथा कुछ में उसके
आत्मत्व का विरोध किया गया है। इसलिए पुत्रादि के आत्मा होने सम्बन्धी
श्रुतियों को अप्रामाणिक कहा जाना तथा आत्मत्वसाधक श्रुतियों को
प्रामाणिक मानना, न्यायसंगत नहीं है क्योंकि श्रुति वेदवाक्य है। अतः वहाँ
कुछ प्रामाणिक हो तथा कुछ अप्रामाणिक यह संगत नहीं हो सकता है।
इसका यही समाधान दिया जा सकता है कि पुत्र आदि को आत्मा बताने
वाले श्रुतिवचन सर्वथा अप्रामाणिक नहीं हैं, अपितु उनमें स्थूल का ज्ञान
कराकर, साधक को सूक्ष्मविषय की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है।
यह जटिलविषय को समझाने की एक शैली कही जा सकती है। इसीको