वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२१२ वेदान्तसार
चित्र-४४
स्थूलशरीरों की
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समष्टि व्यष्टि
वैश्वानर (विराट्) ──> अभेद ── [अधिष्ठातृ देवता] ── अभेद ── विश्व
(१) पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ ──┬─ श्रोत्र ── दिक् ── शब्द ──┐
├─ त्वक् ── वायु ── स्पर्श ──┤
├─ चक्षु ── सूर्य ── रूप ───┼─ ग्रहण करना
├─ रसना ── वरुण ── रस ───┤
└─ घ्राण ── अश्विन् ─ गन्ध ──┘
(२) पञ्चकर्मेन्द्रियाँ ──┬─ वाक् ─── अग्नि ─── बोलना ──────┐
├─ पाणि ── इन्द्र ─── आदान-प्रदान ─┤
├─ पाद ─── उपेन्द्र ─ चलना ──────┼─ क्रियाएँ सम्पादित करना
├─ पायु ─── यम ──── विसर्जन ────┤
└─ उपस्थ ── प्रजापति ─ आनन्द ─────┘
(३) अन्तरिन्द्रियाँ ───┬─ मन ──── चन्द्र ── संकल्प-विकल्प ─┐
├─ बुद्धि ── ब्रह्मा ─ निश्चय ───────┤
├─ अहङ्कार ─ शिव ─── गर्व ─────────┼─ करना
└─ चित्त ── विष्णु ─ स्मरण ────────┘
अवतरणिका—इसप्रकार स्थूलप्रपञ्च का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के
पश्चात् स्थूलमहाप्रपञ्च की समष्टिव्यष्टि एवं उनमें स्थित चैतन्य में ऐक्य
प्रतिपादित करते हैं—
एतेषां स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चानामपि समष्टिरेको महान्प्रपञ्चो भवति
यथावान्तरवनानां समष्टिरेकं महद्वनं भवति यथा वावान्तरजलाशयानां
समष्टिरेको महान् जलाशयः। एतदुपहितं वैश्वानरादीश्वरपर्यन्तं
चैतन्यमप्यवान्तरवनावच्छिन्नाकाशवदवान्तरजलाशयगतप्रतिबिम्बाकाशव-
च्चैकमेव। आभ्यां महाप्रपञ्चतदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं
सदनुपहितं चैतन्यं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति वाक्यस्य वाच्यं भवति