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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २११
(4) यहाँ प्रयुक्त ‘विविधराजमानत्वात्’ का अभिप्राय देव, पशु, मनुष्य,
पर्वत, नदी, समुद्र आदि विविधरूपों में विराजमान होने से, उन सबकी
‘विराट्’ संज्ञा प्रदान करने से है।
(5) इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करने के कारण इसे ‘जाग्रत’ कहा
गया है। शङ्कराचार्य एवं सुबोधिनी टीकाकार इस व्याख्या से सहमत हैं-
(क) इन्द्रियैरर्थोपलब्धिर्जागरितम् (शङ्कराचार्य)
(ख) इन्द्रियैरर्थोपलब्धेश्च जाग्रदवस्थात्वं घटते (सुबोधिनी टीका)
(6) स्थूलशरीरादि में प्रयुक्त ‘आदि’ पद को अधिकांश व्याख्याकार
निरर्थक मानते हैं, किन्तु विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इसे ‘परम स्थूलशरीर’ के
अर्थ में प्रयुक्त माना है।
(7) यहां प्रतिपादित इन्द्रियविषयक देवताओं का अधिष्ठातृत्व
श्रीमद्भागवत में कही गयी परिकल्पना पर आधारित है।
(8) अन्तरिन्द्रियों की संख्या चार मानी गई है-मन, बुद्धि, चित्त एवं
अहंकार। यद्यपि आचार्य सदानन्द ने मन 'और बुद्धि में चित्त और अहङ्कार
का अन्तर्भाव माना है-
“अनयोरेव चित्ताहङ्कारयोरन्तर्भावः” (वेदान्तसार)
(9) विश्व एवं वैश्वानररूप चैतन्य स्थूलशरीरों में स्थित ज्ञानेन्द्रिय,
कर्मेन्द्रिय एवं अन्तःकरणों से सांसारिक स्थूलविषयों का भोग करता है। इन
दोनों में दिखायी देने वाला भेद उपाधिमात्र का है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों
समान हैं।
(10) विश्व एवं वैश्वानर की अन्तरिन्द्रिय तथा बाह्य इन्द्रियों के कार्यों
को यहाँ प्रतिपादित देवताओं के अधिष्ठातृत्व के अनुसार इसप्रकार भी
प्रदर्शित कर सकते हैं-