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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 222

२०८ वेदान्तसार
समूह) से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, अहङ्कार तथा स्मरण आदि इन
सम्पूर्ण स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। “जाग्रत अवस्था से युक्त चैतन्य
ही बाह्यविषयों से परिचित है” इत्यादि श्रुतिवचन भी (यहाँ प्रमाण है)।
यहाँ भी इन दोनों स्थूल व्यष्टि एवं समष्टि में तथा उनसे उपहित विश्व
और वैश्वानर में, वन और वृक्ष एवं उससे अवच्छिन्न आकाश के समान,
जलाशय और जल तथा उसके प्रतिबिम्बित आकाश के समान पूर्ववत् अभेद
होता है। इसप्रकार पञ्चीकृत पाँच महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति होती
है।
‘चन्द्रिका’-स्थूलसृष्टि का कथन करने के उपरान्त समष्टि-व्यष्टि की
दृष्टि से ग्रन्थकार चैतन्य का नामकरण करते हुए उनमें अभेद की स्थापना
करते हैं-सम्पूर्ण स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत बताए गए जरायुज, अण्डज,
उद्भिज्ज एवं स्वेदज चार प्रकार के स्थूलशरीर एकत्व अथवा अनेकत्व की
विवक्षा में प्रत्येक प्राणी की एक बुद्धि तथा अलग-अलग प्राणियों की
अलग-अलग अनेक बुद्धियों का विषय होने से, वन एवं जलाशय के समान
समष्टि तथा वृक्ष एवं जल के समान व्यष्टिरूप में व्यवहृत होते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार सभी वृक्षों को एक साथ
कहने की इच्छा से वन एवं सभी जलों को एक साथ कहने की भावना से
जलाशय इसरूप में कहा जाता है, ठीक उसीप्रकार विभिन्नप्रकार के
स्थूलशरीरों को एक साथ कहने की दृष्टि से एक बुद्धि का विषय तथा
अनेकरूप में कहने की विवक्षा से भिन्न-भिन्न शरीर मानकर विभिन्न
बुद्धियों का विषय स्वीकार किया जाता है। यही क्रमशः समष्टि एवं व्यष्टि
कहलाती है।
इस समष्टि से उपहितचैतन्य को वैश्वानर अथवा विराट् कहा जाता है।
इसका मुख्यकारण यही है कि समष्टि से उपहित यह चैतन्य सभी प्राणियों
में ‘मैं’ इस अभिमान को धारण किए हुए विविधप्रकार से सुशोभित हो रहा
है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत विद्यमान अज्ञान की उपाधियुक्त, चार प्रकार
के स्थूलशरीरों की यह समष्टि विद्वानों द्वारा ‘स्थूलशरीर’ इस नाम से कही
जाती है। इसके अतिरिक्त यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए गए अन्न
द्वारा उत्पन्न होता है, इसलिए ‘अन्नमय’ भी कहलाता है। साथ ही आत्मा
का आच्छादक होने के कारण ‘कोश’ एवं सुखदुःख आदि के भोग का
आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा तत्तत् विषयों को भोगने के कारण ‘जाग्रत्’ भी
कहा जाता है।