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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 221

स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०७
अपरित्यज्य स्थूलशरीरादि-प्रविष्टत्वात्। अस्य अपि एषा व्यष्टिः स्थूलशरीरम्,
अन्नविकारत्वाद् एव हेतोः अन्नमयकोशः, जाग्रद् इति च उच्यते।
तदानीम् एतौ विश्व-वैश्वानरौ दिग्-वात-अर्क-वरुण-अश्विभिः क्रमात्
नियन्त्रितेन श्रोत्रादि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमात्, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धान्,
अग्नि-इन्द्र-उपेन्द्र-यम-प्रजापतिभिः क्रमात् नियन्त्रितेन वाग् आदि
इन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद् वचन-आदान-गमन-विसर्ग-आनन्दान्, चन्द्र-चतुर्मुख-
शङ्कर-अच्युतैः क्रमात् नियन्त्रितेन, मनः-बुद्धि-अहङ्कार-चित्त-आख्येन
अन्तरिन्द्रिय-चतुष्केण क्रमात् सङ्कल्प-निश्चय-अहङ्कार्य-चैत्तान् च सर्वान्
एतान् स्थूलविषयान् अनुभवतः, “जागरितस्थानः बहिःप्रज्ञ” इत्यादि श्रुतेः।
अत्र अपि अनयोः स्थूलव्यष्टि-समष्ट्योः, तद् उपहित विश्व-वैश्वानरयोः,
च, वन-वृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत
प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च पूर्ववद् अभेदः। एवम् पञ्चीकृत पञ्चभूतेभ्यः स्थूल
प्रपञ्च-उत्पत्तिः।।17।।
अनुवाद- यहाँ भी चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, एक और अनेक
बुद्धियों का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि, वृक्ष
अथवा जल के समान व्यष्टि भी होते हैं। इस समष्टिरूप उपाधि से उपहित
हुआ चैतन्य, सभी प्राणियों का अधिष्ठाता होने एवं विविध रूपों में
विराजमान होने के कारण वैश्वानर एवं विराट् कहा जाता है।
समष्टिरूप इसका यह स्थूलशरीर (माता-पिता द्वारा खाए हुए) अन्न का
विकार होने से अन्नमयकोश, स्थूलभागों का आश्रय होने से स्थूलशरीर तथा
(विषयों का भोग करने वाला होने के कारण) जाग्रद् इसप्रकार कहा जाता
है।
इस व्यष्टिरूप उपाधि से उपहित चैतन्य, सूक्ष्मशरीर के अभिमान का
परित्याग किए बिना स्थूलशरीर में प्रविष्ट होने के कारण 'विश्व' इसप्रकार
कहा जाता है। इसका भी यह व्यष्टिरूप स्थूलशरीर, अन्न का विकार होने
से ही अन्नमयकोश तथा जाग्रद् इसप्रकार कहलाता है।
ये दोनों विश्व और वैश्वानर उससमय, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा
अश्विनीकुमारों द्वारा क्रमशः नियन्त्रित श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों से क्रमशः
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का; अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम, प्रजापति
द्वारा क्रमशः नियन्त्रित वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, लेना,
चलना, विसर्जन और आनन्द का; चन्द्र, ब्रह्मा, शिव और विष्णु द्वारा क्रमशः
नियन्त्रित मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त नामक चार अन्तरिन्द्रियों (के