वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 215 of 314
Read in contextपञ्चीकरण प्रक्रिया २०१
सूक्ष्मभूत अपने पाँच भागों में विभक्त हो जाता है-प्रथम 1/2+1/8+1/8+
1/8+1/8=एक (एक आधा भाग तथा शेष चार 1/8 भाग)।
पुनः इन सब भागों में से अपने-अपने आधे भाग को छोड़कर अन्य
सूक्ष्मभूत का एक-एक अष्टमांश 1/8 भाग दूसरे चारों भागों में मिला दिया
जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक महाभूत में आधा अपना तथा शेष चार
सूक्ष्मभूतों का 1/8 अष्टमांश मिलने पर प्रत्येक आकाश आदि भूत पूर्णता
को प्राप्त करके, पञ्चीकृतमहाभूत की संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इस
सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-
चित्र-४१
पञ्चीकरण प्रक्रिया
| | आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी |
| | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 |
| 1/8 | वायु | आकाश | आकाश | आकाश | आकाश |
| 1/8 | अग्नि | अग्नि | वायु | वायु | वायु |
| 1/8 | जल | जल | जल | अग्नि | अग्नि |
| 1/8 | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | जल |
पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत
इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से स्थूलसृष्टि का निर्माण होता है। जिसका वर्णन
आगे किया जाएगा। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका
को प्रमाणरूप में प्रयुक्त करते हैं। इस कारिका का अभिप्राय भी वही है जो
ऊपर गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है।
विशेष-(1) उपर्युक्त प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक विस्तारपूर्वक
चित्रात्मक ढंग से समझने के लिए द्रष्टव्य चित्र संख्या 9 एवं 10
(भूमिका)।
(2) आचार्य सुरेश्वर ने इसी पञ्चीकरणप्रक्रिया को अपने वार्तिक में
इसप्रकार प्रतिपादित किया है, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल प्रतीत होता है-
पृथिव्यादीनि भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा।
एकैकं भागमादाय चतुर्धा विभजेत् पुनः॥
एकैकं भागमेकस्मिन् भूते संवेशयेत्क्रमात्।
ततश्चाकाशभूतस्य भागाः पञ्च भवन्ति हि॥