Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 186 of 314

Read in context
Page 186

१७२ वेदान्तसार
लोहपिण्ड और अग्नि इन दोनों की अभिन्नता यहाँ वाच्यार्थ मानी जाएगी,
जिसकी प्रतीति में अभिधा शब्दशक्ति सहायक होती है। जबकि यहाँ ‘अयः
पिण्ड’ द्वारा अपने से सम्बद्ध अग्नि का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया
जाता है। अतः लोहपिण्ड एवं अग्नि में भिन्नता की प्रतीति का लक्षणा
शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड और अग्नि में
भिन्नता की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा होगी तथा इन दोनों की यह
भिन्नता ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगी।
ठीक इसीप्रकार तत्त्वमसि इत्यादि महाकाव्य में अज्ञानोपहित चैतन्य एवं
तुरीयरूप चैतन्य में अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा तथा इन दोनों की
भिन्नता की प्रतीति कराना ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगा, जिसकी प्रतीति
कराने में लक्षणा शब्दशक्ति सहायक होगी।
ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि में इन तीनों
की इस एकता का प्रतिपादन ही वाच्यार्थरूप में किया गया है। इसके
अतिरिक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य की अपेक्षा विशुद्धचैतन्य की भिन्नता
का प्रतिपादन ही इस महावाक्य या महावाक्यों का लक्ष्यार्थ माना जाएगा।
विशेष-(1) साहित्यदर्पणकार ने लक्षणा का लक्षण इसप्रकार किया
है-
“मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थः प्रतीयते।
रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणाशक्तिरर्पिता।।”
(2) तुरीय-चतुर+छ (चतुरश्छयतावाद्याक्षर लोपश्च) वार्तिक से च लोप।
(3) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-

चित्र-३५

विशुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान          शुद्ध चैतन्य          मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
से उपहित समष्टि                                          से उपहित व्यष्टि
|                                                        |
ईश्वर ―――― तत्                 तुरीय                    त्वम् ―――― जीव
(चतुर्थ)
┌─────────────────┐                                      ┌─────────────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            तत्त्वमसि                 │ भिन्नता की प्रतीति  │
└────────┬────────┘                ↓                     └────────┬────────┘
(वाच्यार्थ)            व्याप्यव्यापकभाव                 (लक्ष्यार्थ)
┌────────┴────────┐                ↓                     ┌────────┴────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            (लोहपिण्ड)                │ भिन्नता की प्रतीति  │
└─────────────────┘                ↓                     └─────────────────┘
(अग्नि)