वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextतुरीय-निरूपण १७१
जैसाकि अनुबन्धचतुष्टय में विषय नामक अनुबन्ध का प्रतिपादन करते
हुए ग्रन्थकार ने कहा कि जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करना ही
इस ग्रन्थ का विषय है-'विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव
वेदान्तानां तात्पर्यात्।' किन्तु अज्ञान की समष्टिव्यष्टि के विवेचन में मुख्य
प्रतिपाद्यविषय कहीं विस्मृत न हो जाए, इस दृष्टि से ग्रन्थकार प्रस्तुत
गद्यखण्ड में विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित समष्टिरूप ईश्वर एवं
मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित व्यष्टिरूप जीव या प्राज्ञरूप चैतन्य
तथा तुरीयरूप विशुद्धचैतन्य, परमब्रह्म ये तीनों तात्त्विकदृष्टि से एक हैं,
क्योंकि इन तीनों में चैतन्य समानरूप से विद्यमान है। ऐसा कहकर ब्रह्म और
जीव की एकता प्रतिपादित करते हैं।
इसी अभिप्राय को समझाने के लिए ग्रन्थकार 'तप्तायः पिण्ड' का
उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। किसी लोहे के टुकड़े को आग में गर्म करके पूरी
तरह लाल कर लेते हैं। इस स्थिति में लोहे के भार आदि पार्थिव अंश के
विद्यमान रहते हुए भी इसमें अग्नि के गुण दाहकता आदि से युक्त होने के
कारण, इसे हम आग का गोला भी कहते हैं, किन्तु उससे जलने पर 'लोहे
के टुकड़े से जल गया' इसप्रकार व्यवहार करते हैं। यहाँ अग्नि लोहे में
व्याप्यव्यापकभाव से विद्यमान होने से दोनों की अभिन्नता का प्रतिपादन
वाच्यार्थ होगा।
प्रस्तुत अंश के अभिप्राय एवं ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों के
आशय को समझने के लिए हमें पहले तीन शब्दशक्तियों को समझना
होगा-(1) अभिधा (2) लक्षणा और (3) व्यञ्जना। इनमें अभिधा-शब्द
के साक्षात् संकेतित अर्थ को कहती है। जैसे- गङ्गायां घोषः उदाहरण में
इसका साक्षात् संकेतित अर्थ है-'जल प्रवाह में बस्ती' (घोष)। यह
संकेतित अर्थ मुख्यार्थ या वाच्यार्थ कहलाएगा; जिसका प्रतिपादन अभिधा
शब्दशक्ति के माध्यम से किया जाता है।
मुख्य अर्थ का बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन द्वारा लक्षणा शब्द
शक्ति अन्य अर्थ की प्रतीति कराती है, जिसे लक्ष्यार्थ कहा जाता है।
जैसे-उपर्युक्त उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' में बस्ती का जलप्रवाह में रहना
असम्भव होने से मुख्यार्थबाध हुआ। अतः प्रयोजनवश लक्षणा शब्दशक्ति
द्वारा हमें तत्सम्बद्ध अन्य 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है तथा यह
तटरूप अर्थ ही लक्ष्यार्थ कहलाता है। तत्पश्चात् व्यञ्जना शब्दशक्ति द्वारा
उस बस्ती में शीतत्व पावनत्व की प्रतीति करायी जाती है। यह शीतत्व
पावनत्व रूप अर्थ व्यङ्ग्यार्थ कहलाएगा।
'तपे हुए लोहे के टुकड़े' (तप्तायः पिण्ड) रूप प्रस्तुत उदाहरण में
दाहकता अग्नि का धर्म है जो लोहे के टुकड़े में समा गया है। इसलिए