वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextअज्ञान निरूपण १५१
ठीक इसीप्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त तथा अद्वैत आदि विशेषताओं
से सम्पन्न एकमात्र ब्रह्म ही वस्तु है, जो काल एवं स्थान की सीमाओं से
परे नित्य है। जबकि स्वयंप्रकाश, अनन्त ब्रह्मरूप इस वस्तु में अज्ञान अथवा
माया के कारण दृश्यमान सम्पूर्ण चराचरजगत् रूप अवस्तु भासित होती
रहती है। इसप्रकार ब्रह्मरूप वास्तविकवस्तु में अज्ञान के कारण चराचरजगत्
की प्रतीति होना, वेदान्त की भाषा में अध्यारोप माना जाएगा।
इसप्रकार यह सम्पूर्ण चराचरजगत् रूप प्रपञ्च वस्तुतः अज्ञान का ही
परिणाम है। इसलिए यहाँ अज्ञान को ही अवस्तु कहा गया है। ब्रह्म के सभी
विशेषणों की व्याख्या विस्तारपूर्वक हम भूमिका में कर चुके हैं। (पृ० 43)
अतः पुनरावृत्ति-भय से उनका यहाँ फिर से उल्लेख नहीं किया जा रहा है।
विशेष – (1) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने 'अध्यारोप' को परिभाषित
किया है।
(2) 'अध्यारोप' वेदान्तदर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिसपर
वेदान्तदर्शनरूपी भवन टिका हुआ है।
(3) वेदान्तदर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' ही एकमात्र वस्तु है तथा शेष
सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च अवस्तु बताया गया है।
(4) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-२७
वस्तु में अवस्तु
ब्रह्म सम्पूर्ण चराचर संसाररूप प्रपञ्च
सत् चित् आनन्द अनन्त अद्वैत की भ्रान्ति
अध्यारोप अज्ञान/माया
सर्प है (अवस्तु) के कारण
अन्धकार या अज्ञान आदि वस्तु (रस्सी) में
के कारण अवस्तु सर्प का आरोप
अज्ञान का स्वरूप-उपर्युक्त गद्यखण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने
अज्ञान के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए इसके, सत्, असत् से भिन्न
अर्थात् अनिर्वचनीय, सत्व, रजस्, तमस् गुणों से युक्त होने के कारण
त्रिगुणात्मक, ज्ञान का विरोधी होने से ज्ञानविरोधी, भावरूप एवं यत्किञ्चित्