वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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अज्ञानम्-तु सद्-असदभ्याम् अनिर्वचनीयम् त्रिगुणात्मकम् ज्ञानविरोधि
भावरूपम् यत्किञ्चिद् इति वदन्ति। 'अहम् अज्ञः' इत्यादि अनुभवात्।
“देवात्मशक्तिम् स्वगुणैः निगूढाम्” इत्यादि श्रुतेः च॥6।।
अनुवाद- सर्प की सत्ता से रहित रस्सी में सर्प के आरोप के समान,
वस्तु में अवस्तु का आरोप ही अध्यारोप है। सच्चिदानन्द, अनन्त और अद्वैत
ब्रह्म वस्तु है तथा अज्ञान आदि से लेकर सम्पूर्ण जड़प्रपञ्च अवस्तु है।
अज्ञान को तो सत् और असत् दोनों से विलक्षण होने से अनिर्वचनीय,
त्रिगुणात्मक, ज्ञान का विरोधी तथा भावरूप होने से 'यत्किञ्चित्' ऐसा
कहते हैं। मैं अज्ञानी हूँ, इत्यादि अनुभव से तथा 'परमात्मा की शक्ति अपने
गुणों से आच्छन्न है' इत्यादि श्रुतिवचन से (इसके अस्तित्व की पुष्टि होती
है।)
‘चन्द्रिका’– प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने सर्वप्रथम 'अध्यारोप' को
सोदाहरण परिभाषित करते हुए कहा कि-- “किसी वस्तु में अज्ञान आदि के
कारण उसी के समान अन्य वस्तु के आरोप को अध्यारोप कहते हैं।
जैसे-मार्ग में पड़ी हुई रस्सी को यदि कोई व्यक्ति अंधकार आदि के कारण
सर्प मान बैठता है। उस स्थिति में देखने वाले का रस्सी-विषयक अज्ञान
सर्प के आकार में परिणत हो जाता है। परिणामस्वरूप वह भयभीत होकर
वहाँ से दूर भागता है इत्यादि।
किन्तु बाद में जब वह टॉर्च आदि से प्रकाश करके उसको पास जाकर
भलीभांति देखता है तो उसका रस्सी-विषयक अज्ञान दूर हो जाता है और
वह निश्चय कर लेता है कि यह वस्तुतः सांप नहीं है, अपितु रस्सी है।
इसी बात को सीपी और चांदी के उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते
हैं-
एक व्यक्ति कुछ दूर पर पड़ी हुई चमचमाती हुई वस्तु को चाँदी
मानकर उसके पास जाकर उसे उठाने का प्रयास करता है। आरम्भ से लेकर
अन्त तक की यह प्रक्रिया 'अध्यारोप' कहलाएगी, क्योंकि चमकती हुई वह
वस्तु वास्तव में चांदी न होकर सीप थी, जो चांदी के समान चमक रही
थी। इसप्रकार यहाँ भी वस्तु सीप में अवस्तु चांदी का आरोप होने से यह
भी वेदान्तदर्शन की परिभाषा के अनुसार 'अध्यारोप' ही कहलाएगा।