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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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Page 161

अनुबन्ध चतुष्टय १४७
करने वाले ब्रह्मनिष्ठ (गुरु के पास जाता है) इत्यादि श्रुतिवाक्य (इसमें
प्रमाण हैं)
वह (गुरु) अत्यन्त कृपापूर्वक 'अध्यारोप-अपवाद-न्याय द्वारा इसे (परम
रहस्य) का उपदेश प्रदान करता है। 'समीप आए हुए उस जिज्ञासु के लिए
वह (ब्रह्मनिष्ठ) विद्वान् उपदेश देता है' इत्यादि श्रुतिवचन भी हैं।
'चन्द्रिका' - सूर्य की प्रचण्ड गर्मीरूपी अग्नि में जिसका अंग-अंग
जला जा रहा है, ऐसा व्यक्ति जिसप्रकार अपनी तपनरूप व्याकुलता को,
बैचेनी को दूर करने के लिए अपने आसपास स्थित तालाब, सरोवर आदि
जलराशि को देखकर जिस तड़पन के साथ उसकी ओर दौड़ता है तथा
उसमें स्नान कर अथवा आकण्ठ डूबकर जिस शान्ति एवं सुख को प्राप्त
करता है। सभी वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करने वाला काम्य एवं निषिद्धकर्मों
का परित्याग करने वाला, नित्यनैमित्तिक, प्रायश्चित्त, उपासनकर्मों का
अनुष्ठान करके निर्मलबुद्धि, नित्य-अनित्यवस्तु-विवेकादि साधन-चतुष्टय-
सम्पन्न प्रमाता अर्थात् अधिकारी जन्म, मरण, वृद्धावस्था एवं रोगादि संसार
के विभिन्न संतापों से ठीक वैसी ही अत्यधिक व्याकुलता का अनुभव
करता है।
जिसे दूर करने के लिए वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार पत्रपुष्पादि
उपहार अपने हाथों में लेकर वेदों का गहन अध्ययन, चिन्तन और मननकर
उनके अगाधज्ञान को हृदयंगम करने वाले, एकमात्र ब्रह्मतत्त्व में श्रद्धा रखने
वाले, ब्रह्मज्ञानी गुरु के समीप जाता है तथा विनम्रभाव से उपहारस्वरूप
भेंट, उनके चरणों में रखकर उनसे ब्रह्मज्ञान के उपदेश का निवेदन करता
है। उसकी विनम्रता आदि के कारण आचार्य द्वारा उसे स्वीकार करने पर,
वह उनके उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुनता है एवं पूर्णतया विनम्रभाव से
उपदेश के अनुसार आचरण करता हुआ मन-वचन और कर्म से गुरु की
सेवा करता है। यहाँ आकर उसे ठीक उसीप्रकार असीमशान्ति का अनुभव
होता है, जैसे-गर्मी से संतप्त व्यक्ति जल के निकट आकर शान्ति का
अनुभव करता है। 'समित्पाणि' इत्यादि श्रुति उक्त कथन में प्रमाण है।
सांसारिकदुःखों से छुटकारा पाने तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए
व्यक्ति को वेदों के ज्ञान से सम्पन्न, ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में अपनी
सामर्थ्य के अनुसार समिधादि लेकर ही जाना चाहिए। यहाँ प्रयुक्त 'समित्'
शब्द को उपलक्षण मानना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि यदि व्यक्ति
इतना निर्धन हो कि वह गुरु को देने के लिए कोई वस्तु ले जाने में सक्षम
न हो तो वह पत्र-पुष्प अथवा यज्ञहेतु समिधाएँ ही अपने हाथों में लेकर