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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 160 of 314

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Page 160

१४६ वेदान्तसार
(५) उक्त गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-२५
अनुबन्ध-चतुष्टय
┌───────┬────────────────┬───────────────────────────┬───────────────────┐
│ 1 │ 2 │ 3 │ 4 │
│अधिकारी│ विषय │ सम्बन्ध │ प्रयोजन │
│ │ │ ┌────────────┐ │ ┌────────────┬──────────┐ │ ┌───────────────┐ │
│(पूर्व │ │जीव और ब्रह्म │ │ │जीव और ब्रह्म│ उपनिषद् │ │ │अज्ञान की │ │
│में │ │का ऐक्य │ │ │का ऐक्य │ वाक्य │ │ │निवृत्ति होने से│ │
│व्याख्या│ │प्रतिपादन │ │ └──────┬─────┴─────┬────┘ │ │आत्मदर्शन द्वारा│ │
│किया जा│ └────────────┘ │ │ │ │ │चरम आनन्द │ │
│चुका है)│ │ ▼ ▼ │ │की प्राप्ति │ │
│ │ │ ┌─────────────────────┐ │ └───────────────┘ │
│ │ │ │ बोध्य ───> बोधकभाव │ │ │
│ │ │ └─────────────────────┘ │ │
└───────┴────────────────┴───────────────────────────┴───────────────────┘
अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करने के बाद ग्रन्थकार
'अधिकारी' के आचरण एवं तत्पश्चात् गुरु के व्यवहार का कथन करते हुए
कहते हैं-
अयमधिकारी जननमरणादिसंसारानलसन्तप्तो प्रदीप्तशिरोजलराशि-
मिवोपहारपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसृत्य तमनुसरति "समित्पाणिः
श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं" इत्यादिश्रुतेः। स परमकृपयाध्यारोपापवाद-
न्यायेनैनमुपदिशति "तस्मै स विद्वानुपसन्नाय प्राह" इत्यादिश्रुतेः॥५॥
पदच्छेद-अयम् अधिकारी जनन-मरण-आदि संसार-अनल-संतप्तः
दीप्तशिरः जलराशिम् इव उपहारपाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम् गुरुम् उपसृत्य
तम् अनुसरति। 'समित् पाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि श्रुते।
सः (गुरुः) परमकृपया 'अध्यारोप-अपवाद, न्यायेन एनम् उपदिशति।
'तस्मै सः विद्वान् उपसन्नाय प्राह' इत्यादि श्रुतेः॥5॥
अनुवाद-जिसप्रकार भयानकगर्मी से अत्यधिक तप्त हुआ व्यक्ति अपनी
तपनरूपी व्याकुलता को दूर करने के लिए जलराशि के पास जाता है।
उसीप्रकार यह (वेदान्त का) अधिकारी जन्म, मरण आदि संसाररूप
कष्टाग्नि से संतप्त होकर हाथ में उपहार ग्रहण करके, वेदों का अध्ययन
करने वाले, ब्रह्म में अगाधनिष्ठा रखने वाले आचार्य के पास जाकर उसका
अनुसरण करता है। 'समिधा हाथ में लिए हुए (शिष्य) वेदों का अध्ययन