वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextअनुबन्ध चतुष्टय १४३
अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय के प्रथम अनुबन्ध अधिकारी की विस्तृत
व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार उसके शेष तीन अनुबन्धों-विषय, सम्बन्ध
एवं प्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं-
विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव वेदान्तानां तात्पर्यात्।
सम्बन्धस्तु तदैक्यप्रमेयस्य तत्प्रतिपादकोपनिषत्प्रमाणस्य च
बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनं तु तदैक्यप्रमेयगताज्ञाननिवृत्तिः
स्वस्वरूपानन्दावाप्तिश्च "तरति शोकमात्मवित्" इत्यादिश्रुतेः "ब्रह्मविद्
ब्रह्मैव भवति" इत्यादि श्रुतेश्च॥४॥
पदच्छेद- विषयः-जीव-ब्रह्म-ऐक्यम् शुद्धचैतन्यम् प्रमेयम् तत्रैव
वेदान्तानाम् तात्पर्यात्। सम्बन्धः-तु तद् ऐक्य प्रमेयस्य तत्
प्रतिपादक-उपनिषत् प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनम्-तु तद् ऐक्य
प्रमेयगत-अज्ञाननिवृत्तिः स्व-स्वरूप-आनन्द-अवाप्तिः च। "तरति शोकम्
आत्मवित्" इत्यादि श्रुतेः। "ब्रह्मवित् ब्रह्म एव भवति" इत्यादि श्रुतेः च॥4।।
अनुवाद- (वेदान्त का प्रतिपाद्य) विषय-जीव और ब्रह्म की एकता है।
शुद्धचैतन्य (ही यहाँ) प्रमा (ज्ञान) का विषय है, क्योंकि समस्त वेदान्त
वाक्यों का अभिप्राय उसी (शुद्धचैतन्य) के प्रतिपादन में निहित है।
ज्ञान के विषय उन जीव और ब्रह्म का ऐक्य एवं उनका प्रतिपादन करने
वाले उपनिषद्रूप प्रमाणवाक्यों का (परस्पर) बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है।
जबकि उस जीव एवं ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की
निवृत्तिपूर्वक अपने स्वरूप का परिचय होने से चरम आनन्द की प्राप्ति ही
(इस शास्त्र का) मुख्य प्रयोजन है।
"आत्मज्ञानी शोक से तर जाता है" इत्यादि तथा "ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म ही हो
जाता है" इत्यादि श्रुति का (कथन यहाँ प्रमाण है)।
'चन्द्रिका'-ग्रन्थ के आरम्भ में ग्रन्थकार ने प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ
वेदान्तसार के अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन इस 'अनुबन्धचतुष्टय'
का उल्लेख करने के पश्चात् अधिकारी पद की विस्तृत व्याख्या की। पुनः
प्रस्तुत गद्यखण्ड में शेष तीन अनुबन्धों-'विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन' की
व्याख्या प्रस्तुत करते हैं-
(१) विषय-प्रस्तुत वेदान्तसार में जीव और ब्रह्म दोनों की एकता
प्रतिपादित की गयी है और यही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्यविषय भी है।
यहाँ जीव से अभिप्राय सामान्यप्राणी से है, जिसको हम प्रतिदिन अपनी