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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 156 of 314

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Page 156

१४२ वेदान्तसार
अन्वय-प्रशान्तचित्ताय, जितेन्द्रियाय, प्रहीणदोषाय, यथोक्त-कारिणे,
गुणान्विताय, च अनुगताय मुमुक्षवे सर्वदा एतत् सकलम् (ज्ञानम्) प्रदेयम्।।
इति।।
अनुवाद- अत्यन्त शान्तचित्त, इन्द्रियों को वश में करने वाले, निर्मल
अन्तःकरण वाले, पूर्वोक्त बातों का पालन करने वाले, (विवेकादि) गुणों से
सम्पन्न, गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले (उसके वाक्यों में श्रद्धा रखने
वाले) मोक्ष के इच्छुक व्यक्ति को ही हमेशा यह सम्पूर्ण वेदान्त का ज्ञान
प्रदान करना चाहिए।
'चन्द्रिका'- जिस व्यक्ति का मन सांसारिक भोगविलासविषयक सामग्री
की ओर से विरक्त होकर एकमात्र आत्मतत्त्व के चिन्तन अथवा ब्रह्मज्ञान के
साधनभूतश्रवण मननादि में स्थिर होकर शान्तभाव को प्राप्त हो गया हो।
जिसने अपनी बाह्य इन्द्रियों श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण आदि को
पूर्णतया अपने वश में कर लिया हो तथा जिसकी ये सभी इन्द्रियाँ
अपने-अपने विषयों की ओर न जाकर श्रवणमननादि ब्रह्मसाक्षात्कार के
साधनों के प्रति ही आकृष्ट होती हों। जिसने काम्य एवं निषिद्धकर्मों का
पूर्णतया परित्याग करके नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त एवं उपासन आदि कर्मों
द्वारा अपने अन्तःकरण को पूर्णतया निर्मल बना लिया हो।
साथ ही जिसमें नित्य-अनित्यवस्तुओं के सम्बन्ध में विवेक ने स्थान
बना लिया हो तथा जिसे इस लोक एवं परलोकविषयक फलभोगसामग्री के
प्रति वैराग्य हो गया हो। इसके अतिरिक्त जो अभिमानरहित अत्यन्त विनम्र-
भाव से गुरु की सेवा एवं उनकी आज्ञापालन में आनन्द का अनुभव करता
हो। जो गुरु की प्रत्येक आज्ञा को माला के समान अपने मस्तक पर धारण
करते हुए, उनके प्रत्येक वचन के प्रति अगाधश्रद्धा एवं आस्था धारण करे।
मोक्ष के प्रति प्रबल इच्छा रखने वाले इसप्रकार के अधिकारी व्यक्ति को ही
आत्मविषयक ज्ञान प्रदान करना चाहिए।
विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका वस्तुतः यहाँ तक विवेचन किए गए
अधिकारी के गुणों का अत्यन्त संक्षिप्तरूप कहा जा सकता है।
(2) ग्रन्थकार ने इसे अपनी बात की पुष्टि में प्रमाणरूप में प्रस्तुत
किया है।
(3) कारिका में प्रयुक्त 'गुणान्विताय' को विद्वानों ने सद्-असद् विवेक,
त्याग तथा क्षमारूप गुणों से युक्त अर्थ में भी प्रयुक्त माना है।